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________________ १, ५, ३३४] कालाणुगमे सण्णिमग्गणा [ १६७ पमत्तसंजदप्पहुडि जाव उवसंतकसाय-वीदराग-छदुमत्था ति केवाधरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ।। ३२३ ।। प्रमत्तसंयतसे लेकर उपशान्तकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक उपशमसम्यग्दृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय होते हैं ॥ ३२३ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ ३२४ ।। नाना जीवोंकी अपेक्षा उक्त गुणस्थानवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ३२४ ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ ३२५ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका जघन्य काल एक समय है ॥ ३२५ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ ३२६ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उन्हींका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ३२६ ॥ सासणसम्मादिट्ठी ओघं ॥ ३२७ ॥ सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं ॥ ३२८ ॥ मिच्छादिट्ठी ओघं ॥ ३२९ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥३२७॥ सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥ ३२८ ॥ मिथ्यादृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥ ३२९ ।। सणियाणुवादेण सण्णीसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ।। ३३० ॥ संज्ञीमार्गणाके अनुवादसे संज्ञी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ ३३० ॥ एगजीव पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ ३३१ ॥ एक जीवकी अपेक्षा संज्ञी मिथ्पादृष्टि जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ३३१ ॥ उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं ॥ ३३२ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल सागरोपमशतपृथक्त्व मात्र है ॥ ३३२ ॥ सासणसम्मादिटिप्पहुडि जाव खीणकसाय-बीदराग-छदुमत्था त्ति ओधं ॥ ३३३ सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक संज्ञियोंकी कालप्ररूपणा ओघके समान है ॥ ३३३ ॥ असण्णी केवचिरं कालादो होति ? णाणाजीवं पदुच्च सम्बद्धा ।। ३३४ ॥ असंज्ञी जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥३३४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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