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________________ १, ५, २७० ] कालाणुगमे संजममग्गणा [१६१ समान है ॥ २६०॥ सासणसम्मादिट्ठी ओघं ॥ २६१ ॥ मत्यज्ञानी और श्रुत-अज्ञानी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥२६॥ विभंगणाणीसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ।। विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ २६२॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ २६३ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ २६३ ॥ उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि ॥ २६४ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस सागरोपम है ।।२६४ ॥ सासणसम्मादिट्ठी ओघं ।। २६५ ॥ विभंगज्ञानी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २६५ ॥ आभिणिबोहियणाणि-सुदणाणि-ओधिणाणीसु असंजदसम्मादिट्टिप्पहुडि जाव खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था त्ति ओघं ॥ २६६ ॥ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तकके जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २६६ ॥ मणपज्जवणाणीसु पमत्तसंजदप्पहुडि जाब खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था त्ति ओघं ॥ २६७ ॥ मनःपर्ययज्ञानियोंमें प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तकके जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २६७ ॥ केवलणाणीसु सजोगिकेवली अजोगिकेवली ओघं ॥ २६८ ॥ केवलज्ञानियोंमें सयोगिकेवली और अयोगिकेवली जीवोंके कालकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २६८ ॥ संजमाणुवादेण संजदेसु पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि ति ओघं ॥२६९ संयममार्गणाके अनुवादसे संयतोंमें प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगिकेवली तक सामान्यसे संयत जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २६९ ॥ सामाइयच्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदेसु पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति ओघं ।। सामायिक और छेदोपस्थापना शुद्धिसंयतोंमें प्रमत्तसंयत गुणस्थानसे लेकर अनिवृत्तिकरण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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