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________________ १,५,२५० ] कालाणुगमे कसायमग्गणा [१५९ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ २४१ ॥ एक जीवकी अपेक्षा नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टियोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ २४१ ।। उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियढें ॥ २४२ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका उत्कृष्ट काल अनन्तकालात्मक असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है ॥ २४२ ॥ सासणसम्मादिट्ठी ओघं ॥ २४३ ॥ नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २४३ ॥ सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं ॥ २४४ ॥ नपुंसकवेदी सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका काल ओघके समान है ।। २४४ ॥ असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादो होति ? णाणाजीवं पडुच्च सम्बद्धा ॥२४५ नपुंसक असंयतसम्यग्दृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ २४५॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ २४६ ॥ एक जीवकी अपेक्षा नपुंसकवेदी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है। उक्कस्सेण तेत्तीस सागरोवमाणि देसूणाणि ॥ २४७ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त नपुंसकवेदी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल कुछ कम ( छह अन्तर्मुहूर्त कम ) तेतीस सागरोपम है ॥ २४७ ॥ संजदासंजदप्पहुडि जाव अणियट्टि ति ओघं ॥२४८॥ संयतासंयतसे लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक नपुंसकवेदी जीवोंका काल ओघके समान हैं ॥ २४८॥ अपगदवेदएसु अणियट्टिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं ॥ २४९ ।। अपगतवेदी जीवोंमें अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके अवेदभागसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तकके जीवोंका काल ओघके समान है ॥ २४९ ॥ ___ कसायाणुवादेण कोहकसाइ-माणकसाइ-मायकसाइ-लोभकसाईसु मिच्छादिट्ठिप्पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदा ति मणजोगिभंगो ॥ २५० ।। कषायमार्गणाके अनुवादसे क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर अप्रमत्तसंयत तकका काल मनोयोगियोंके समान है ॥२५० ॥ दोण्णि तिण्णि उवसमा केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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