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________________ १५० ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ५, १५९ सकायिक मिथ्यादृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक दो हजार सागरोपम और त्रसकायिक पर्याप्तक जीवोंका उत्कृष्ट काल पूरे दो हजार सागरोपम प्रमाण है ॥ १५९ ॥ सासणसम्मादिहिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं ॥ १६० ॥ सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक उक्त त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त जीवोंका काल ओघके समान है ॥ १६० ॥ तसकाइयअपज्जत्ताणं पंचिदियअपज्जत्तभंगो ॥ १६१ ॥ त्रसकायिक लब्ध्यपर्याप्तकोंका काल पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकोंके समान है ॥ १६१ ॥ जोगाणुवादेण पचमणजोगिपंचवचिजोगीसु मिच्छादिट्ठी असंजदसम्मादिट्ठी संजदासजदा पमत्तसंजदा अप्पमत्तसंजदा सजोगिकेवली केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ॥ १६२ ॥ योगमार्गणाके अनुवादसे पांचों मनोयोगी और पांचों वचनयोगी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगिकेवली कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल होते हैं ॥ १६२ ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ।। १६३ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका जघन्य काल एक समय है ॥ १६३ ॥ यहां पांचों मनोयोगी और पांचों वचनयोगी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि एवं असंयतसम्यग्दृष्टि आदि उक्त छह गुणस्थानवी जीवोंके एक समय मात्र जघन्य कालका जो निर्देश किया गया है वह योगपरिवर्तन, गुणस्थानपरिवर्तन, मरण और व्याघातकी अपेक्षासे समझना चाहिये। यथा योगपरिवर्तनकी अपेक्षा ... कोई एक सासादनसम्यग्दृष्टि आदि जीव मनोयोगके साथ अवस्थित था। उसके मनोयोगकालके एक समय मात्र अवशिष्ट रहनेपर वह उस मनोयोगके साथ मिथ्यादृष्टि हो गया। तत्पश्चात् वह मिथ्यादृष्टि ही रह कर वचनयोगी अथवा काययोगी हो गया । इस प्रकार योगपरिवर्तनकी अपेक्षा मनोयोगी मिथ्याष्टेि जीवका एक समय मात्र जघन्य काल उपलब्ध हो जाता है । गुणस्थानपरिवर्तनकी अपेक्षा ..... कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव वचनयोग अथवा काययोगके साथ स्थित था। उसके इन योगोंके कालके क्षीण होनेपर वह मनोयोगी हो गया और एक समय मात्र मिथ्यात्वके साथ मनोयोगी रहकर द्वितीय समयमें वह सम्यग्मिथ्यादृष्टि अथवा असंयमके साथ सम्यग्दृष्टि या संयतासंयत अथवा अप्रमत्तभावके साथ संयत हो गया, इस प्रकार गुणस्थानपरिवर्तनकी अपेक्षा मनोयोगी मिथ्यादृष्टिका एक समय मात्र जघन्य काल उपलब्ध हो जाता है । कोई एक मिथ्यादृष्टि वचनयोग अथवा काययोगके साथ स्थित था। उसके इन योगोंके कालके क्षीण हो जानेपर वह मनोयोगी हो गया तथा उस मनोयोगके साथ एक समय मिथ्यादृष्टि Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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