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________________ १, ५, १५९ ] काला गमे कायमग्गणा जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ १४८ ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ १४९ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है ॥ १४९ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ १५० ॥ उक्त जीवोंका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ १५० ॥ सुमविकाइया हुमआउकाइया मुहुमते काइया सुहुमवाउकाइया सुहुमवणफदिकाइया हुमणिगोदजीवा तस्सेव पञत्तापजत्ता मुहुमेदियपजत्त-अपजताणं भंगो ॥ सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म जलकायिक, सूक्ष्म तेजकायिक, सूक्ष्म वायुकायिक, सूक्ष्म वनस्पतिकायिक, सूक्ष्म निगोद जीव और उनके ही पर्याप्त तथा अपर्याप्त जीवोंका काल सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और अपर्याप्तोंके कालके समान है ॥ १५१ ॥ [ १४९ autoदिकाइयाणं एइंदियाणं भंगो ।। १५२ ॥ वनस्पतिकायिक जीवोंका काल एकेन्द्रिय जीवोंके कालके समान है ॥ १५२ ॥ णिगोदजीवा केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा || १५३ ॥ निगोद जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥१५३॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ १५४ ॥ एक जीवकी अपेक्षा निगोद जीवोंका जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है ॥ १५४ ॥ उक्कस्सेण अड्डाइज्जादो पोग्गलपरियङ्कं ॥ १५५ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका उत्कृष्ट काल अढ़ाई पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है ॥ १५५ ॥ बादरणिगोदजीवाणं बादरपुढविकाइयाणं भंगो ॥ १५६ ॥ बादर निगोद जीवोंका काल बादर पृथिवीकायिक जीवोंके समान है ॥ १५६॥ तसकाइय-तसकाइयपञ्जत्तसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ॥ १५७ ॥ कायिक और कायिक पर्याप्तकोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ।। १५७ ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं ॥ १५८ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ १५८ ॥ उक्कस्त्रेण वे सागरोवमसहस्त्राणि पुच्चकोडिपुधत्तेजन्महियाणि, वे सागरोवमसहस्राणि ।। १५९ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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