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________________ १, ५, ४७ ] कालाणुगमे गदिमग्गणा [१३७ प्रथम पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी तक नारकियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ ४० ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णण अंतोमुहत्तं ॥ ४१ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त पृथिवियोंके नारकी मिथ्यादृष्टि जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है ॥ ४१ ॥ उक्कस्सेण सागरोवम तिण्णि सत्त दस सत्तारस बावीस तेत्तीस सागरोवमाणि ।। उक्त सातों पृथिवियोंके नारकी मिथ्यादृष्टियोंका उत्कृष्ट काल क्रमश: एक, तीन, सात, दस, सतरह, बाईस और तेतीस सागरोपम प्रमाण है ॥ ४२ ॥ उनका यह उत्कृष्ट काल विवक्षित पृथिवीके नारक जीवोंकी उत्कृष्ट आयुके अनुसार समझना चाहिये। सासणसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं ॥ ४३ ॥ सातों पृथिवियोंके सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका नाना और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य व उत्कृष्ट काल ओघके समान है ॥ ४३ ॥ असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादो होति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्बद्धा ।। ४४॥ सातों पृथिवियोंमें नारक असंयतसम्यग्दृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं । ४४ ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहत्तं ॥ ४५ ॥ ____ एक जीवकी अपेक्षा सातों पृथिवियोंके नारकी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ४५ ॥ उक्कस्सं सागरोवमं तिण्णि सत्त दस सत्तारस बावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि ॥ ४६॥ सातों पृथियोंके नारकी असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका उत्कृष्ट काल क्रमशः कुछ कम एक, तीन, सात, दस, सतरह, बाईस और तेतीस सागरोपम है ॥ ४६ ॥ यहां कुछ कमका प्रमाण प्रथम पृथिवीसे सातवीं पृथिवी तक पर्याप्तियोंकी पूर्णता, विश्राम और विशुद्धि सम्बन्धी तीन अन्तर्मुहूर्त तथा सातवीं पृथिवीमें छह ( सूत्र ३९ के अनुसार ) अन्तर्मुहूर्त समझना चाहिये। तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा ॥ ४७॥ छ.१८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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