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________________ १, ५, २४ ] कालाणुगमे ओघणिद्देसो [१३३ चउण्हं उवसमा केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ चारों उपशामक जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय होते हैं ॥ २२॥ उपशमश्रेणीसे उतरनेवाले दो अथवा तीन अनिवृत्तिकरण उपशामक जीव एक समय मात्र जीवनके शेष रहनेपर अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशामक हुए। पश्चात् एक समय मात्र उस अपूर्वकरण गुणस्थानके साथ रहकर द्वितीय समयमें मरे और देव हो गये। इस प्रकार अपूर्वकरण उपशामकका वह एक समय प्रमाण जघन्य काल प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार शेष तीन उपशामकोंके भी एक समयकी प्ररूपणा नाना जीवोंके आश्रयसे करना चाहिये । विशेष बात यह है कि अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती उपशामक जीवोंके एक समयकी प्ररूपणा तो उपशमश्रेणीपर चढ़ते और उतरते हुए जीवोंका आश्रय करके दोनों प्रकारोंसे भी करना चाहिये। किन्तु उपशान्तकषाय उपशामकके उस एक समयकी प्ररूपणा चढ़ते हुए जीवोंके ही आश्रयसे करनी चाहिये। उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ २३ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा चारों उपशामकोंका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ २३ ॥ सात आठसे लेकर चौवन तक अप्रमत्तसंयत जीव एक साथ अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशामक हुए। जब तक वे अनिवृत्तिकरण गुणस्थानको नहीं प्राप्त होते हैं तब तक अन्य अन्य भी अप्रमत्तसंयत जीव अपूर्वकरण गुणस्थानको प्राप्त होते गये। इसी प्रकारसे उपशमश्रेणीसे उतरनेवाले अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती उपशामकोंको भी अपूर्वकरण गुणस्थानको प्राप्त कराना चाहिये । इस प्रकार चढ़ते और उतरते हुए अपूर्वकरण उपशामक जीवोंसे शून्य न होकर अपूर्वकरण गुणस्थान उसके योग्य उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है। इसके पश्चात् निश्चयसे उसका अभाव हो जाता है। इसी प्रकारसे अन्य तीनों उपशामकोंके भी प्रकृत उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा करना चाहिये । विशेष बात यह है कि उपशान्तकषाय उपशामकके उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा करते समय एक उपशान्तकषाय जीव चढ़ करके जब तक उतरता नहीं है तब तक अन्य अन्य सूक्ष्मसाम्परायिक संयत जीवोंके लिये उपशान्तकषाय गुणस्थानको चढ़ाना चाहिये । इस प्रकारसे पुनः पुनः संख्यात वार जीवोंको चढ़ाकर उसके योग्य उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त कालके प्राप्त होने तक उपशान्तकाल बढ़ाना चाहिये । एगजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ २४ ॥ एक जीवकी अपेक्षा चारों उपशामकोंका जघन्य काल एक समय मात्र है ॥ २४ ॥ एक अनिवृत्तिकरण उपशामक जीव एक समय मात्र जीवनके शेष रहनेपर अपूर्वकरण उपशामक हुआ और एक समय अपूर्वकरण उपशामक रहकर द्वितीय समयमें मरणको प्राप्त होता हुआ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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