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१२६] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं
[ १, ४, १८३ असंखेज्जदिभागो ॥ १८३ ॥
. आहारक जीवोंमें प्रमत्तसंयत गुणस्थानसे लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवी जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥१८३
अणाहारएसु कम्मइयकायजोगिभंगो ॥ १८४ ॥
अनाहारक जीवोंमें जिन गुणस्थानोंकी सम्भावना है उन गुणस्थानवी जीवोंका स्पर्शनक्षेत्र कार्मणकाययोगियोंके स्पर्शनक्षेत्रके समान है ॥ १८४ ॥
णवरि विसेसा, अजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १८५ ॥
विशेष बात यह है कि अयोगिकेवलियोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १८५ ॥
॥ इस प्रकार स्पर्शानुगम समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
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