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________________ फोसणाणुगमे वेदमग्गणा अट्ठ व चोदभागा वा देसूणा ।। १०५ ।। स्त्री और पुरुषवेदी सासादनसम्यग्दृष्टियोंने अतीत और अनागत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह तथा नौ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ।। १०५ ॥ १, ४, ११२ ] वे विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घातकी अपेक्षा आठ बटे चौदह भागोंको तथा मारणान्तिकसमुद्घातकी अपेक्षा नौ बटे चौदह भागोंको स्पर्श करते हैं, यह सूत्रका अभिप्राय समझना चाहिये । [ ११७ सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १०६ ॥ स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी सम्यग्मिथ्यादृष्टि तथा असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १०६ ॥ अट्ट चोहसभागा वा देखणा फोसिदा ।। १०७ ॥ उक्त जीवोंने अतीत और अनागत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ १०७ ॥ संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १०८ ॥ स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी संयतासंयत जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया ॥ १०८ ॥ छ चोदसभागा वा देणा ॥ १०९ ॥ त्रवेदी और पुरुषवेदी संयतासंयत जीवोंने अतीत और अनागत कालकी अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं ॥ १०९ ॥ पत्तसंजद पहुडि जाव अणियविउवसामग - खवगेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ११० ॥ स्त्रीवेदी और पुरुषवेदियों में प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण उपशामक और क्षपक गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ ११० ॥ उंसयवेदसु मिच्छादिट्ठी ओधं ॥ १११ ॥ नपुंसकवेदी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंका स्पर्शनक्षेत्र ओधके समान सर्व लोक है ॥ १११ ॥ सास सम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं १ लोगस्स असंखेजदिभागो ॥ ११२ ॥ नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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