SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 203
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७८ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, २, १४० क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ और अयोगिकेवली जीवोंकी द्रव्यप्ररूपणा सामान्य प्ररूपणाके समान है ॥ १३९ ॥ सजोगिकेवली ओघं ॥ १४० ॥ सयोगिकेवली जीवोंके द्रव्यप्रमाणकी प्ररूपणा सामान्य प्ररूपणाके समान है ॥ १४० ॥ अब ज्ञानमार्गणाकी अपेक्षा जीवोंकी संख्याका निरूपण करते हैं णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणीसु मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? ओघं ॥ १४१ ॥ ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? ओघ प्ररूपणाके समान हैं ॥ १४१ ॥ विभंगणाणीसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया ? देवेहि सादिरेयं ॥१४२।। विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? देवोंसे कुछ अधिक हैं। सासणसम्माइट्ठी ओघं ॥१४३ ॥ विभंगज्ञानी सासादनसम्यग्दृष्टि जीव ओघ प्ररूपणाके समान पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं ॥ १४३ ॥ आभिणिबोहियणाणि-सुदणाणि-ओहिणाणीसु असंजदसम्माइटिप्पहुडि जाव खीणकसाय-वीदराग-छदुमत्था त्ति ओघं ॥ १४४ ॥ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव ओघ प्ररूपणाके समान हैं।। णवरि विसेसो ओहिणाणीसु पमत्तसंजदप्पहुडि जावं खीणकसाय-चीयरायछदुमत्था त्ति दव्वपमाणेण केवडिया ? संखेज्जा ।। १४५ ॥ इतना विशेष है कि अवधिज्ञानियोंमें प्रमत्तसंयत गुणस्थानसे लेकर क्षीणकषाय-वीतरागछद्मस्थ गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव द्रव्यप्रमाणसे कितने हैं ? संख्यात हैं ॥ १४५ ॥ मणपज्जवणाणीसु पमत्तसंजप्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराग-छदुमत्था त्ति दव्वपमाणेण केवडिया ? संखेजा ॥ १४६ ॥ मनःपर्ययज्ञानियोंमें प्रमत्तसंयत गुणस्थानसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? संख्यात हैं ॥ १४६ ॥ केवलणाणीसु सजोगिकेवली अजोगिकेवली ओघं ॥ १४७ ॥ केवलज्ञानियोंमें सयोगिकेवली और अयोगिकेवली जीवोंकी द्रव्यप्ररूपणा सामान्य प्ररूपणाके समान है ॥ १४७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy