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________________ ७० ] केवडिया ? असंखेज्जा ॥ ७७ ॥ द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव तथा उन्हींके पर्याप्त और अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ॥ ७७ ॥ छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, २, ७७ असंखेज्जाहि ओसपिणि उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण ॥ ७८ ॥ कालकी अपेक्षा द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीव तथा उन्हींके पर्याप्त और अपर्याप्त जीव असंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत होते हैं ॥ ७८ ॥ खेत्तेण बेइंदिय-तीइंदिय- चउरिंदिय तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्ते हि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदिभागवरगपडिभाएण अंगुलस्स संखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण ।। ७९ ॥ क्षेत्रकी अपेक्षा द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवोंके द्वारा सूच्यंगुलके असंख्यातवें भागके वर्गरूप प्रतिभागसे जगप्रतर अपहृत होता है । तथा उन्हींके पर्याप्त और अपर्याप्त जीवोंके द्वारा क्रमशः सूच्यंगुलके संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभागसे और सूच्यंगुलके असंख्यातवें भागके वर्गरूप प्रतिभागसे जगप्रतर अपहृत होता है ॥ ७९ ॥ पंचिदिय-पंचिदियपज्जत्तरसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया ? असंखेज्जा | पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवोंमें मिथ्यादृष्टि द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ? ॥ ८० ॥ असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण ॥ ८१ ॥ कालकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत होते हैं ॥ ८१ ॥ खेत्तेण पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु मिच्छाइट्ठीहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण अंगुलस्स संखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण || ८२ ।। क्षेत्रकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टियों के द्वारा सूच्यंगुलके असंख्यातवें भागके वर्गरूप प्रतिभागसे और सूच्यंगुलके संख्यातवें भागके वर्गरूप प्रतिभागसे जगप्रतर अपहृत होता है ॥ ८२ ॥ Jain Education International सासणसम्माइट्ठप्प हुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं ॥ ८३ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव सामान्य प्ररूपणाके समान पल्योपमके असंख्यातवें भाग हैं | अब लब्ध्यपर्याप्त पंचेन्द्रिय जीवोंके प्रमाणका निरूपण करते हैं- पंचिंदियअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया ? असंखेज्जा ॥ ८४ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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