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________________ १, २, ९० ] Goaपमाणागमे कायमग्गणा [ ७१ पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ॥ ८४ ॥ असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण ॥ ८५ ॥ कालकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों द्वारा अपहृत होते हैं ॥ ८५ ॥ खेत्तेण पंचिदियअपज्जत्तएहि पदरमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदिभागवग्गपडिभाएण || ८६ । क्षेत्रकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंके द्वारा सूच्यंगुलके असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभागसे जगप्रतर अपहृत होता है ॥ ८६ ॥ कायावादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाड्या वाउकाइया बादर पुढविकाइया बादरआउकाइया बादरतेङकाइया बादरवाउकाइया बादरवणप्फइकाइया पत्तेयसरीरा तस्सेव अपज्जत्ता हुमपुढविकाइया सुहुमआउकाड्या सुहुमतेउकाइया सुहुमवाउकाइया तस्सेव पज्जत्तापज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया ? असंखेज्जा लोगा ॥ ८७ ॥ कायानुवादसे पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेजकायिक, वायुकायिक जीव तथा बादर पृथ्वीकायिक, बादर अप्कायिक, बादर तेजकायिक, बादर वायुकायिक, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर जीव, तथा इन्हीं पांच बादर सम्बन्धी अपर्याप्त जीव, सूक्ष्म पृथ्वीकायिक, सूक्ष्म अप्कायिक, सूक्ष्म तेजकायिक, सूक्ष्म वायुकायिक जीव, तथा इन्हीं चार सूक्ष्म सम्बन्धी पर्याप्त और अपर्याप्त जीव; ये प्रत्येक द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात लोक प्रमाण हैं ॥ ८७ ॥ अब बादर पर्याप्तोंकी संख्याका प्ररूपण करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैं— बादर पुढविकाइय बाद आउकाइय- बादरवणफइकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया ? असंखेज्जा ॥ ८८ ॥ बादर पृथ्वीकायिक, बादर अप्कायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ॥ ८८ ॥ असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण ॥। ८९ ।। कालकी अपेक्षा बादर पृथ्वीकायिक, बादर अष्कायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत होते हैं । बादरपुढ विकाइय- बादरआउकाइय- बादरवण फइकाइय- पत्तेय सरीर पज्जतहि परमवहिरदि अंगुलस्स असंखेज्जदिभागवग्गपडिभागेण ।। ९० ।। क्षेत्रकी अपेक्षा बादर पृथ्वीकायिक, बादर अप्कायिक और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्तक जीवोंके द्वारा सूच्यंगुलके असंख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभागसे जगप्रतर अपहृत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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