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________________ १, १, १२५] संतपरूवणाए संजममग्गणा [ ४१ यहां द्रव्यार्थिक नयकी विवक्षा होनेसे शेष संयमभेदोंको इसीके अन्तर्गत समझना चाहिये । उस एक ही व्रतका छेद अर्थात् दो तीन आदिके भेदसे उपस्थापन अर्थात् व्रतोंके धारण करनेको छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयम कहते हैं। यह छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयम पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा रखनेवाला है। जिसके हिंसाका परिहार ही प्रधान है ऐसे शुद्धिप्राप्त संयतको परिहारशुद्धिसंयत कहते हैं । विशेषतासे जिसने तीस वर्ष तक अपनी इच्छानुसार भोगोंको भोगते हुए सामान्य और विशेषरूपसे संयमको धारण कर प्रत्याख्यान पूर्वका अभ्यास किया है तथा जिसके तपोविशेषसे परिहारऋद्धि उत्पन्न हो चुकी है ऐसा जीव तीर्थंकरके पादमूलमें परिहारशुद्धिसंयमको ग्रहण करता है । इस संयमको धारण करनेवाला खड़े होने, गमन करने, भोजन-पान करने और बैठने आदि संपूर्ण व्यापारों में प्राणियोंकी हिंसाके परिहारमें समर्थ होता है। सांपराय ' नाम कषायका है । जिनकी कषाय सूक्ष्म हो गई है वे सूक्ष्मसांपराय कहे जाते हैं । जो सूक्ष्म कषायवाले होते हुए शुद्धि-प्राप्त संयत हैं उन्हें सूक्ष्मसांपराय-शुद्धिसंयत कहते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि सामायिक और छेदोपस्थापना संयमको धारण करनेवाले साधु जब कषायको अतिशय सूक्ष्म कर लेते हैं तब वे सूक्ष्मसांपराय-शुद्धि-संयत कहलाते हैं । जिनके परमागममें प्रतिपादित विहार अर्थात् कषायोंके अभावरूप अनुष्ठान पाया जाता है उन्हें यथाख्यातविहार कहते हैं । जो यथाख्यातविहारवाले होते हुए शुद्धि-प्राप्त संयत हैं वे यथाख्यात-विहार-शुद्धिसंयत कहलाते हैं। ___ जो पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रतोंसे संयुक्त होते हुए कर्मनिर्जरा करते हैं ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव संयतासंयत कहे जाते हैं । उनके दर्शनिक, व्रतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तविरत, ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत; ये ग्यारह भेद हैं। जो जीव छह कायके प्राणियों एवं इन्द्रियविषयोंमें विरत नहीं होते हैं उन्हें असंयत जानना चाहिये। अब संयतोंमें गुणस्थानोंकी संख्याका निरूपण करनेके लिये सूत्र कहते हैं--- संजदा पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ॥ १२४ ।। संयत जीव प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक होते हैं । १२४ ॥ अब संयमके गुणस्थानोंका प्रतिपादन करने के लिये सूत्र कहते हैंसामाइयच्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा पमत्तसंजदप्प हुडि जाव अणियट्टि ति।।१२५।। सामायिक और छेदोपस्थापनारूप शुद्धिको प्राप्त हुए संयत जीव प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक होते हैं ॥ १२५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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