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________________ [ ३९ १, १, ११९] संतपरूवणाए णाणमग्गणा अनक्षरात्मक अथवा शब्दजन्य और लिंगजन्य इस प्रकार दो भेद हैं। उनमें शब्दजन्य श्रुतज्ञान मुख्य है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, और भावकी अपेक्षा जिस ज्ञानके विषयकी अवधि ( सीमा ) हो. उसे अवधिज्ञान कहते हैं । विषयकी अवधि ( सीमा ) के रहनेसे इसे परमागममें ' सीमाज्ञान ' भी कहा गया है। इसके भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय इस प्रकार दो भेद हैं । जिसका भूत कालमें चिन्तवन किया गया है, अथवा जिसका भविष्य कालमें चिन्तवन किया जावेगा, अथवा जो अर्धचिन्तित है ऐसे अनेक भेदरूप दूसरेके मनमें स्थित पदार्थको जो जानता है उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं । यह ज्ञान मनुष्यक्षेत्रके भीतर संयत जीवोंके ही होता है। जो तीनों लोकोंके समस्त पदार्थोंको युगपत् जानता है उसे केवलज्ञान कहते हैं। अब मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका विशेष कथन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैंमदिअण्णाणी सुदअण्णाणी एइंदियप्पहुडि जाव सासणसम्माइट्टि त्ति ॥११६॥ मति-अज्ञानी और श्रुत-अज्ञानी जीव एकेन्द्रियसे लेकर सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान पर्यंत होते हैं ॥ ११६॥ अब विभंगज्ञानका विशेष प्रतिपादन करने के लिये उत्तरसूत्र कहते हैंविभंगणाणं सण्णिमिच्छाइट्ठीणं वा सासणसम्माइट्ठीणं वा ॥ ११७ ॥ विभंगज्ञान संज्ञी मिथ्यादृष्टि जीवोंके और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंके होता है ॥११७॥ जब कि यह विभंगज्ञान भवप्रत्यय है तब उसका सद्भाव पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों ही अवस्थाओंमें होना चाहिये, इस प्रकारके सन्देहके निराकरणार्थ उत्तरसूत्र कहते हैं पज्जत्ताणं अत्थि, अपजत्ताणं णत्थि ॥ ११८ ॥ वह विभंगज्ञान पर्याप्तकोंके होता है, अपर्याप्तकोंके नहीं होता ॥ ११८ ॥ अभिप्राय यह है कि अपर्याप्त अवस्थासे युक्त देव और नारक पर्याय विभंगज्ञानका कारण नहीं है, किन्तु पर्याप्त अवस्थासे युक्त देव और नारक पर्याय ही उस विभंगज्ञानका कारण है। इसीलिये वह अपर्याप्तकालमें उनके नहीं होता है । __ अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ज्ञानका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैं सम्मामिच्छाइटिट्ठाणे तिण्णि वि णाणाणि अण्णाणेण मिस्साणि-आभिणिबोहियणाणं मदिअण्णाणेण मिस्सयं सुदणाणं सुदअण्णाणेण मिस्सयं ओहिणाणं विभंगणाणेण मिस्सयं, तिण्णि वि णाणाणि अण्णाणेण [अण्णाणि णाणेण] मिस्साणि वा इदि ॥११९।। ___ सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें आदिके तीनों ही ज्ञान अज्ञानसे मिश्रित होते हैं- आभिनिबोधिकज्ञान मत्यज्ञानसे मिश्रित होता है , श्रुतज्ञान श्रुत-अज्ञानसे मिश्रित होता है, तथा अवधिज्ञान विभंगज्ञानसे मिश्रित होता है । अथवा तीनों ही ज्ञान अज्ञानसे [अज्ञान ज्ञानसे ] मिश्रित होते हैं ॥ ११९ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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