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________________ १, १, ५९ ] संतपरूवणाए जोगमग्गणा [ २५ औदारिकशरीर द्वारा उत्पन्न हुई शक्तिसे जीव के प्रदेशोमें परिस्पन्दका कारणभूत जो प्रयत्न होता है उसे औदारिककाययोग कहते हैं । पुरु, महत्, उदार और उराल ये शब्द एकार्थवाचक हैं। उदारमें जो होता है उसे औदारिक और उसके निमित्तसे होनेवाले योगको औदारिककाययोग कहते हैं । यह औदारिकशरीर जब तक पूर्ण नहीं होता है तब तक मिश्र कहलाता है । उसके निमित्तसे होनेवाले योगको औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं । जो शरीर अणिमा - महिमा आदि अनेक ऋद्धियोंसे संयुक्त होता है उसे वैक्रियिकशरीर और उसके निमित्तसे होनेवाले योगको वैक्रियिककाययोग कहते हैं । वह वैक्रियिकशरीर जब तक पूर्ण नहीं होता है तब तक मिश्र कहलाता है । उसके द्वारा होनेवाले योगको वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहा जाता है । जिसके द्वारा आत्मा सूक्ष्म पदार्थोंका आहरण (ग्रहण) करता है उसे आहारकशरीर और उस आहारकशरीरसे जो योग होता है उसे आहारककाययोग कहते हैं । अभिप्राय यह है कि छठे गुणस्थानवर्ती मुनिके चित्तमें सूक्ष्म तत्त्वगत संदेह उत्पन्न होनेपर वह जिस शरीरके द्वारा केवलीके पास जाकर सूक्ष्म पदार्थोका आहरण ( ग्रहण ) करता है उसे आहारकशरीर और उसके द्वारा होनेवाले योगको आहारककाययोग कहते हैं । वह आहारकशरीर जब तक पूर्ण नहीं होता है तब तक उसको आहारकमिश्र कहते हैं । उसके द्वारा जो योग होता है उसे आहारकमिश्रकाययोग कहते हैं । यह आहारकशरीर सूक्ष्म होनेके कारण गमन करते समय वैक्रियिकशरीरके समान न तो पर्वतोंसे टकराता है, न शस्त्रोंसे छिदता हैं, और न अग्निसे जलता भी है । ज्ञानावरणादि आठ प्रकारके कर्मोंके स्कन्धको कार्मणशरीर कहते हैं । अथवा जो कार्मणशरीर नामकर्मके उदयसे उत्पन्न होता है उसे कार्मणशरीर कहते हैं । उसके द्वारा होनेवाले योगको कार्मणकाययोग कहते हैं। यह योग एक, दो अथवा तीन समय तक होता है । अब औदारिककाययोग और औदारिकमिश्रकाययोग किसके होते हैं, इसका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैं ओरालियकायजोगो ओरालियमिस्सकायजोगो तिरिक्ख- मणुस्साणं ॥ ५७ ॥ औदारिककाययोग और औदारिकमिश्रकाययोग तिर्यंच और मनुष्योंके होते हैं ॥ ५७ ॥ आगे वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोग किन जीवोंके होता है, इसका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैं--- छ ४ व्किायजोगो वे व्त्रियमिस्सकायजोगो देव- रइयाणं ।। ५८ ।। वैक्रियिककाययोग और वैक्रियिकमिश्रकाययोग देव और नारकियोंके होता है ॥ ५८ ॥ अब आहारककाययोगके स्वामीका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैंआहारकायजोगो आहार मिस्सकायजोगो संजदाणमिढिपत्ताणं ।। ५९ ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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