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________________ १०] छक्खंडागमे जीवद्वाणं अब उपशमश्रेणिके अन्तिम गुणस्थानके प्रतिपादनार्थ उत्तर सूत्र कहते हैं उवसंत- कसाय- वीयराग-छदुमत्था ।। १९ ।। सामान्यसे उपशान्तकषाय वीतराग-छद्मस्थ जीव हैं ॥ १९ ॥ जिनकी कषाय उपशान्त हो गई है उन्हें उपशान्तकषाय कहते हैं, तथा जिनका राग नष्ट हो गया है उन्हें वीतराग कहते हैं । छद्म नाम ज्ञानावरण और दर्शनावरणका है, उसमें जो रहते हैं उन्हें छद्मस्थ कहते हैं । जो वीतराग होते हुए भी छद्मस्थ होते हैं उन्हें वीतराग छद्मस्थ कहते हैं । इसमें आये हुए वीतराग विशेषणसे दसवें गुणस्थान तकके सराग छद्मस्थोंका निराकरण समझना चाहिये । जो उपशान्तकषाय होते हुए भी वीतराग छद्मस्थ होते हैं उन्हें उपशान्तकषाय- वीतराग छद्मस्थ कहते हैं । इस उपशान्तकषाय विशेषणसे उपरिम गुणस्थानोंका निराकरण समझना चाहिये । इस गुणस्थानमें संपूर्ण पाएं उपशान्त हो जाती हैं, इसलिये यहां चारित्रकी अपेक्षा औपशमिक भाव है । तथा सम्यग्दर्शन की अपेक्षा पूर्ववत् औपशमिक और क्षायिक दोनों भाव हैं । जिस प्रकार वर्षा ऋतुके गंदले पानी में निर्मली फल डाल देनेसे उसका गंदलापन नीचे बैठ जाता है और जल स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार समस्त मोहनीयकर्मके उपशमसे उत्पन्न हुए परिणामोंमें जो निर्मलता उत्पन्न होती है उसको उपशान्तकाय गुणस्थान समझना चाहिये । अब निर्ग्रन्थ गुणस्थानका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तर सूत्र कहते हैं खीण-कसाय वीयराग छदुमत्था ॥ २० ॥ सामान्य से क्षीणकषाय- वीतराग छद्मस्थ जीव हैं ॥ २० ॥ जिनकी कषाय क्षीण हो गई है उनको क्षीणकषाय कहते हैं। जो क्षीणकषाय होते हुए वीतराग होते हैं उन्हें क्षीणकषाय- वीतराग कहते हैं । जो क्षीणकषाय - वीतराग होते हुए छद्मस्थ होते हैं उन्हें क्षीणकषाय- वीतराग छद्मस्थ कहते हैं । इस सूत्र में आया हुआ छद्मस्थ पद अन्तदीपक है । इसलिये उसे पूर्ववर्ती समस्त गुणस्थानोंके छद्मस्थपनेका सूचक समझना चाहिए। यहां चूंकि दोनों ही प्रकारका मोहनीयकर्म सर्वथा नष्ट हो जाता है, अतएव इस गुणस्थानमें चारित्र और सम्यग्दर्शन दोनोंकी ही अपेक्षा क्षायिक भाव रहता है । [ १, १, १९. जिसन संपूर्ण रूपसे प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश बन्धरूप मोहनीय कर्मको नष्ट कर दिया है, अतएव जिसका अन्तःकरण स्फटिक मणिके निर्मल भाजनमें रखे हुए जलके समान निर्मल हो गया है ऐसे वीतरागी निर्ग्रन्थ साधुओंको क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती समझना चाहिये । अब स्नातकोंके गुणस्थानका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तर सूत्र कहते हैं- Jain Education International सजोगकेवली ॥ २१ ॥ सामान्यसे सयोगकेवली जीव हैं ॥ २१ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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