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________________ ८] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, १, १५ गुणस्थानमें क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक भाव भी रहता है । संज्वलन और नोकषायके तीव्र उदयसे जो चारित्रके पालनमें असावधानता होती है उसे प्रमाद कहते हैं। वह स्त्रीकथा, भक्तकथा, राष्ट्रकथा और अवनिपालकथा इन चार विकथाओं; क्रोध, मान, माया और लोभ इन' चार कषायों; स्पर्शन, रसना, प्राण, चक्षु और श्रोत्र इन पांच इंद्रियों; तथा निद्रा और प्रणयके भेदसे पन्द्रह प्रकारका है । __ आगे क्षायोपशमिक संयमोंमें शुद्ध संयमसे उपलक्षित गुणस्थानका निरूपण करनेके . लिये उत्तर सूत्र कहते हैं अपमत्तसंजदा ॥ १५ ॥ सामान्यसे अप्रमत्तसंयत जीव होते हैं ॥ १५॥ जिनका संयम उपर्युक्त पन्द्रह प्रकारके प्रमादसे रहित होता है उन्हें अप्रमत्तसंयत कहते हैं। इस गुणस्थानमें संयमकी अपेक्षा क्षायोपशमिक भाव रहता है। कारण कि यहां वर्तमान समयमें प्रत्याख्यानावरणीय कर्मके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदयक्षय होनेसे और आगामी कालमें उदयमें आनेवाले उन्हींका उदयाभावलक्षण उपशम होनेसे तथा संचलन कपायका मन्द उदय होनेसे वह संयम उत्पन्न होता है । सम्यक्त्वकी अपेक्षा यहां क्षायिक, क्षायोपशमिक और औपशमिक भाव भी है। अब आगे चारित्रमोहनीयका उपशम या क्षपण करनेवाले गुणस्थानोंमेंसे प्रथम गुणस्थानका निरूपण करनेके लिये उत्तर सूत्र कहते हैं... - अपुव्वकरणपविट्ठसुद्धिसंजदेसु अत्थि उवसमा खवा ॥ १६ ॥ सामान्यसे अपूर्वकरणप्रविष्ट-शुद्धि-संयतोमें उपशमक और क्षपक दोनों प्रकारके जीव होते हैं ॥१६॥ करण शब्दका अर्थ परिणाम होता है। जो परिणाम पूर्व अर्थात इस गुणस्थानसे पहले कभी प्राप्त नहीं हुए हैं उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि नाना जीवोंकी अपेक्षा प्रथम समयसे लेकर प्रत्येक समयमें क्रमसे बढ़ते हुए असंख्यात लोकप्रमाण परिणामवाले इस गुणस्थानके अन्तर्गत विवक्षित समयवर्ती जीवोंको छोड़कर अन्य समयवर्ती जीवोंके न प्राप्त हो सकनेवाले परिणाम अपूर्व कहे जाते हैं । ये अपूर्व परिणाम जिनके हुआ करते हैं वे अपूर्वकरणप्रविष्ट-शुद्धिसंयत कहलाते हैं। उनमें जो जीव चारित्रमोहनीयकर्मके उपशम करनेमें उद्युक्त होते हैं वे उपशमक तथा . जो उसके क्षय करनेमें उद्युक्त होते हैं वे क्षपक कहे जाते हैं। - अपूर्वकरणको प्राप्त हुए उन सब क्षपक और उपशमक जीवोंके परिणामोंमें अपूर्वपनेकी अपेक्षा समानता पाई जाती है। इस गुणस्थानमें क्षपक जीवोंके क्षायिक तथा उपशमक जीवोंके "औपशमिक भाव पाया जाता है। परन्तु सम्यग्दर्शनकी अपेक्षा क्षपकके क्षायिक तथा उपशमके औपशमिक और क्षायिक भाव पाया जाता है । इसका कारण यह है जिस जीवने दर्शनमोहका क्षय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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