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________________ १, १, १४ ] संतपरूवणाए ओघणिदेसो सम्यग्दृष्टि, कभी सम्यग्मिथ्यादृष्टि और कभी वेदकसम्यग्दृष्टि भी हो जाता है । वेदकसम्यग्दृष्टि, जीक शिथिल श्रद्धानी होता है । जिस प्रकार वृद्ध पुरुष अपने हाथमें लकड़ीको शिथिलतापूर्वक पकड़ता है उसी प्रकार वह भी तत्त्वार्थके विषयमें शिथिलश्रद्धानी होता है। इस गुणस्थानमें क्षायिकसम्यक्त्वकी अपेक्षा क्षायिक, औपशमिक सम्यक्त्वकी अपेक्षा औपशमिक और वेदकसम्यक्त्वकी अपेक्षा क्षायोपशमिक भाव भी होता है। ___ सूत्रमें सम्यग्दृष्टिके लिये जो असंयत विशेषण दिया गया है वह अन्तदीपक है । इसलिये वह अपनेसे नीचेके तीनों ही गुणस्थानोंके असंयतपनेका निरूपण करता है । तथा इस सूत्रमें जो सम्यग्दृष्टिपद है वह गंगानदीके प्रवाहके समान ऊपरके समस्त गुणस्थानोमें अनुवृत्तिको प्राप्त होता है। अब देशविरत गुणस्थानके प्ररूपणके लिये उत्तर सूत्र कहते हैंसंजदासजदा ॥ १३ ॥ सामान्यसे संयतासंयत जीव होते हैं ॥ १३ ॥ पंचम गुणस्थानवी जीवमें संयमभाव और असंयमभाव इन दोनोंको एक साथ स्वीकार कर लेनेपर भी कोई विरोध नहीं आता है, क्योंकि, उन दोनोंकी उत्पत्तिके कारण भिन्न भिन्न हैं। उसके संयमभावकी उत्पत्तिका कारण त्रसहिंसासे विरतिभाव और असंयमभावकी उत्पत्तिका कारण स्थावरहिंसासे अविरति भाव है । इसलिये यह संयतासंयत नामका पांचवां गुणस्थान बन जाता है । संयमासंयमभाव क्षायोपशमिकभाव है, क्योंकि, अप्रत्याख्यानावरणीय कषायके वर्तमानकालीन सर्वघाती स्पर्धकोंका उदयाभावी क्षय और आगामी कालमें उदय आने योग्य उन्हींका सदवस्थारूप उपशम होनेसे तथा प्रत्याख्यानावरणीय कषायके उदयसे यह संयमासंयम होता है। ! अब संयतोंके प्रथम गुणस्थानका निरूपण करनेके लिये उत्तर सूत्र कहते हैंपमत्तसंजदा ॥ १४ ॥ सामान्यसे प्रमत्तसंयत जीव होते हैं ॥ १४ ॥ प्रकर्षसे जो मत्त है उन्हें प्रमत्त कहते हैं । अर्थात् प्रमादसहित जीवोंका नाम प्रमत्त है, जो अच्छी तरहसे विरति या संयमको प्राप्त है उन्हें संयत कहते हैं । अभिप्राय यह कि जो प्रमादसे सहित होते हुए भी संयत होते हैं उन्हें प्रमत्तसंयत कहते हैं । छठे गुणस्थानमें प्रमादके रहते हुए भी संयमका अभाव नहीं होता है । यहां 'प्रमत्त' शब्द अन्तदीपक है। इसीलिये इससे पहिलेके सब ही गुणस्थानोंमें प्रमादका सद्भाव समझना चाहिये । इस गुणस्थानमें संयमकी अपेक्षासे क्षायोपशमिक भाव रहता है । कारण यह कि वर्तमानमें प्रत्याख्यानावरणके सर्वधाती स्पर्धकोंका उदयक्षय होनेसे और आगामी कालमें उदयमें आनेवाले सत्तामें स्थित उन्हींके उदयमें न आनेरूप उपशमसे तथा संज्वलन कषायके उदयसे वह संयम उत्पन्न होता है। सम्यग्दर्शनकी अपेक्षा इस Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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