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________________ छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, १, ११ । सम्यक्त्वकी विराधनाको आसादन कहते हैं । जो इस आसादनसे युक्त है उसे सासादन कहते हैं । अभिप्राय यह कि अनन्तानुबन्धिचतुष्कमेंसे किसी एकका उदय होनेपर जिसका सम्यग्दर्शन नष्ट हो गया है, किन्तु जो मिथ्यात्व कर्मके उदयसे उत्पन्न होनेवाले मिथ्यात्वरूप परिणामोंको प्राप्त नहीं हुवा है ऐसे मिथ्यात्व गुणस्थानके अभिमुख हुए जीवको सासादन कहते हैं । - अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्र कहते हैं ----- सम्मामिच्छाइट्ठी ॥ ११ ॥ सामान्यसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव हैं ॥ ११ ॥ दृष्टि, श्रद्धा, रुचि और प्रत्यय ये पर्यायवाची नाम हैं । जिस जीवके समीचीन और मिथ्या दोनों प्रकारकी दृष्टि होती है उसको सम्यग्मिथ्यादृष्टि कहते हैं। जिस प्रकार दही और गुडको मिला देनेपर उनके स्वादको पृथक् नहीं किया जा सकता है, किन्तु उनका मिला हुआ स्वाद मिश्रभावको प्राप्त होकर जात्यन्तरस्वरूप होता है उसी प्रकार सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप मिले हुए परिणामोंका नाम मिश्र गुणस्थान है। मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे जिस प्रकार सम्यक्त्वका निरन्वय नाश होता है उस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे सम्यक्त्वका निरन्वय नाश नहीं होता । इस गुणस्थानमें मिथ्यात्व प्रकृतिके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदयक्षय, उन्हींका सदवस्थारूप उपशम तथा सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदय रहनेसे क्षायोपशमिक भाव रहता है। अथवा सम्यक्त्व प्रकृतिके देशघाती स्पर्धकोंका उदयक्षय, उन्हींके सदवस्थारूप उपशम तथा मिथ्यात्व प्रकृतिके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदय रहनेसे क्षायोपशमिक भाव रहता है । - अब सम्यग्दृष्टि गुणस्थानका निरूपण करनेके लिये उत्तर सूत्र कहते हैं असंजदसम्माइट्ठी ॥ १२ ॥ सामान्यसे असंयतसम्यग्दृष्टि जीव हैं ॥ १२ ॥ जिसकी दृष्टि समीचीन होती है उसे सम्यग्दृष्टि कहते हैं और संयमरहित सम्यग्दृष्टिको असंयतसम्यग्दृष्टि कहते हैं। वे सम्यग्दृष्टि जीव तीन प्रकारके हैं. क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि (क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टि) और औपशमिकसम्यग्दृष्टि । अनन्तानुबन्धी चार और मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्व इन सात प्रकृतियोंके सर्वथा विनाशसे जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि होता है । इन्हीं सात प्रकृतियोंके उपशमसे वह उपशमसम्यग्दृष्टि तथा सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयसे वेदकसम्यग्दृष्टि होता है । यह वेदकसम्यक्त्व- मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके उदयक्षय और सदवस्थारूप उपशमसे तथा सम्यक्त्व प्रकृतिके देशघाती स्पर्धकोंके उदयसे हुआ करता है, इसीलिये इसको क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन कहा जाता है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव कभी मिथ्यात्वको नहीं प्राप्त होता। किन्तु उपशमसम्यग्दृष्टि जीव परिणामोंके निमित्तसे उपशम सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वको प्राप्त हो जाता है । वह कभी सासादन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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