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________________ १, १, १०] संतपरूवणाए ओघणिद्देसो [५ इस अनुयोगद्वारमें उन्हींकी वर्तमान अवगाहनाकी प्ररूपणा की जाती है । (४) स्पर्शनानुगम- उनके ही अतीतकालविशिष्ट स्पर्शका वर्णन करता है । (५) कालानुगम- जिसमें उक्त द्रव्योंकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिका वर्णन हो उसे कालानुगम कहते हैं । (६) अन्तरानुगम- जिन द्रव्योंके स्तित्वादिका ज्ञान हो चुका है उन्हींके अन्तरकालकी प्ररूपणा अन्तरानुगम अनुयोगद्वार करता है। (७) भावानुगम- उक्त द्रव्योंके भावकी प्ररूपणा करनेवाले अनुयोगद्वारका नाम भावानुगम अनुयोगद्वार है। (८) अल्पबहुत्वानुगम- अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार एक दूसरेकी अपेक्षा उन्हीं द्रव्योंकी हीनाधिकताका निरूपण करता है । अब पहले सत्प्ररूपणाके स्वरूपका निरूपण करनेके लिये सूत्र कहते हैं..... संतपरूवणदाए दुविहो णिद्देसो ओघेण आदेसेण य ॥८॥ सत्प्ररूपणामें ओघकी अपेक्षा और आदेशकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका होता है ॥८॥ निर्देश शब्दका अर्थ प्ररूपणा या व्याख्यान होता है । ओघसे अभिप्राय सामान्य और आदेशसे अभिप्राय विशेषका है । सूत्रका अर्थ करते समय यहां पूर्व सूत्रोक्त 'चोद्दसण्हं जीवसमासाणं' इस पदकी अनुवृत्ति करनी चाहिये । इसलिये उसका यह अर्थ होता है कि चौदह जीवसमासोंके सत्त्वका निरूपण ओघ और आदेश इन दो प्रकारोंसे किया जाता है । जीव जिन औदयिकादि भावोंमें भले प्रकारसे रहते हैं उन्हें जीवसमास कहते हैं। वे औदयिकादि भाव ये हैं-- जो भाव कर्मोके उपशमसे उत्पन्न होता है उसे औपशमिक भाव कहते हैं । जो कर्मोके क्षयसे उत्पन्न होता है उसे क्षायिक भाव कहते हैं । जो भाव कोंके क्षय और उपशमसे होता है उसे क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। अभिप्राय यह है कि विवक्षित कर्मप्रकृतिके सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयक्षय, उसीके सदवस्थारूप उपशम, तथा देशघाती स्पर्धकोंके उदयसे जो भाव उत्पन्न होता है उसे क्षायोपशमिक भाव कहा जाता है । जो भाव कोंके उदय, उपशम, क्षय और क्षयोपशमकी अपेक्षाके विना जीवके खभावमात्रसे उत्पन्न होता है उसे पारिणामिक भाव कहते हैं। अब ओघ अर्थात् गुणस्थानप्ररूपणका कथन करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैंओघेण अत्थि मिच्छाइट्टी ॥९॥ सामान्यसे मिथ्यादृष्टि जीव हैं ॥ ९॥ मिथ्या, वितथ, अलीक और असत्य ये एकार्थवाची नाम हैं। दृष्टि शब्दका अर्थ दर्शन या श्रद्धान होता है । इससे यह तात्पर्य हुआ कि जिन जीवोंके विपरीत, एकान्त, विनय, संशय और अज्ञानरूप मिथ्यात्वकर्मके उदयसे उत्पन्न हुई दृष्टि मिथ्या होती है उन्हें मिथ्यादृष्टि जीव कहते हैं । अब दूसरे गुणस्थानका कथन करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं - सासणसम्माइट्ठी ॥ १० ॥ सामान्यसे सासादनसम्यग्दृष्टि जीव हैं ॥ १० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org |
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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