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________________ १, १, ४] संतपरूवणाए मग्गणासरूपं [३ गति कहते हैं । सामान्यरूपसे वह गति चार प्रकारकी है- देवगति, मनुष्यगति, तिर्यंचगति और नरकगति। २ इन्द्रिय- चूंकि स्पर्शनादि इन्द्रियां इन्द्र के समान अपने अपने विषयके ग्रहण करने में स्वयं ही समर्थ हैं, अतएव उन्हें इन्द्रिय शब्दसे संबोधित किया जाता है। अथवा इन्द्रका अर्थ आत्मा होता है, उस आत्माके जो लिंग या चिन्ह हैं उन्हें इन्द्रियां कहते हैं। ३ काय- पृथिवी आदि नामकर्मोके उदयसे जो संचित होता है उसका नाम काय है। अथवा योगरूप आत्माकी प्रवृत्तिसे संचयको प्राप्त हुए औदारिकादिरूप पुद्गलपिंडको काय समझना चाहिये । वह काय पृथिवीकाय आदिके भेदसे छह प्रकारका है । वे पृथिवी आदि छह काय त्रसकाय और स्थावरकाय इन दो भेदोंमें अन्तर्हित हैं । ४ योग- शरीर नामकर्मके उदयके अनुसार मन, वचन और कायसे संयुक्त जीवकी जिस शक्तिके निमित्तसे कर्मका आगमन होता है उसे योग कहते हैं। ___ ५ वेद- वेद कर्मके उदयसे जीव भिन्न भिन्न भावोंका (स्त्रीभाव, पुरुषभाव, नपुंसकभावका) जो वेदन करता है उसे वेद कहते हैं। ६ कषाय- जो सुख व दुःख आदिरूप अनेक प्रकारके धान्यको उत्पन्न करनेवाले कर्मरूपी क्षेत्रको कर्षण करते हैं उन्हें कषाय कहते हैं। ७ ज्ञान- जिसके द्वारा जीव त्रिकालवर्ती समस्त द्रव्य, उनके गुण और अनेक प्रकारकी पर्यायोंको प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसे जानता है उसको ज्ञान कहते हैं । ८ संयम- अहिंसादि व्रतोंका धारण करना, ईर्या-भाषादिरूप समितियोंका परिपालन करना, क्रोधादि कषायोंका जीतना, अनर्थदण्डोंका परित्याग करना और पांचों इन्द्रियोंका दमन करना; इसका नाम संयम है । अभिप्राय यह है कि त्याज्य विषयसे जो निवृत्ति और ग्राह्य विषयमें जो प्रवृत्ति होती है उसे संयम कहते हैं। ९ दर्शन- सामान्य-विशेषात्मक आत्मस्वरूपका जो अवभासन होता है उसे दर्शन कहते हैं । आगममें अन्तर्मुख चित्प्रकाशको दर्शन और बहिर्मुख चित्प्रकाशको ज्ञान माना गया है । अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्तिमें निमित्तभूत जो प्रयत्न होता है तद्रूपसे परिणत आत्माके संवेदनको दर्शन और तत्पश्श्चात् बाह्य पदार्थके विषयमें जो विकल्परूप ग्रहण होता है उसे ज्ञान समझना चाहिये । यही इन दोनोमें भेद भी है। १० लेश्या- जिसके द्वारा जीव पुण्य और पापसे अपनेको लिप्त करता है उसका नाम लेश्या है । यह लेश्या शब्दका निरुक्तत्यर्थ है । तात्पर्य यह कि कषायानुरंजित जो योगोंकी प्रवृत्ति होती है उसे लेश्या कहते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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