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________________ २] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, १, २ साधु- जो मोक्षप्राप्तिके कारणभूत रत्नत्रयके सिद्ध करनेमें सदा तत्पर रहते हैं और समस्त प्राणियोंके विषयमें समताभावको धारण करते हैं वे साधु कहलाते हैं। ग्रंथारम्भके पहिले मंगल, ग्रंथरचनाका कारण, प्रयोजन, ग्रंथका प्रमाण, नाम और कर्ता; इन छहके कथन करनेकी आचार्यपरंपरागत शैली है। तदनुसार श्री पुष्पदन्ताचार्यने उक्त मंगल आदिके प्ररूपणार्थ यह मंगलसूत्र कहा है । यह मंगलसूत्र णमोकार-मंत्रके नामसे प्रसिद्ध है । 'मं पापं गालयति इति मंगलम्' अर्थात् जो पापरूप मलका गालन करे उसे मंगल कहते हैं। द्रव्यमल और भावमलके भेदसे मल दो प्रकारका है। इनमें द्रव्यमल भी दो प्रकारका है- बाह्य द्रव्यमल और अभ्यन्तर द्रव्यमल । उनमें पसीना, धूलि और मल-मूत्र आदि बाह्य द्रव्यमल हैं। सघनरूपमें आत्मासे सम्बद्ध प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश इन भेदोंमें विभक्त ऐसे ज्ञानावरणादि आठ प्रकारके कर्म अभ्यन्तर द्रव्यमल कहे जाते हैं। अज्ञान एवं अदर्शन आदि परिणामोंको भावमल कहते हैं। अथवा ' मंग' शब्दका अर्थ पुण्य या सुख होता है। अत एव ' मंगं सुखं लाति आदत्ते इति मंगलम्' इस निरुक्तिके अनुसार जो सुखको लाता है उसे मंगल कहते हैं। अब चौदह गुणस्थानोंके अन्वेषणमें प्रयोजनभूत होनेसे यहां सर्वप्रथम गति आदि चौदह मार्गणाओंके जान लेनेकी प्रेरणा की जाती है एत्तो इमेसिं चोदसण्हं जीवसमासाणं मग्गणट्ठदाए तत्थ इमाणि चोद्दस चेव ट्ठाणाणि णायव्वाणि भवंति ॥ २॥ ___ यहां इन चौदह जीवसमासों अर्थात् मिथ्यात्वादि गुणस्थानोंकी प्ररूपणामें जीवोंके अन्वेषणमें प्रयोजनभूत होनेसे ये चौदह मार्गणास्थान जान लेनेके योग्य हैं ॥२॥ जीवाः समस्यन्ते संक्षिप्यन्ते एषु इति जीवसमासाः' इस निरुक्तिके अनुसार जिनमें अनन्तानन्त जीवोंका संक्षेप किया जाता है उन्हें जीवसमास कहते हैं । इस प्रकार यहां जीवसमाससे चौदह गुणस्थानोंका ग्रहण होता है । मार्गणा, गवेषण और अन्वेषण ये समानार्थक शब्द हैं । जहांपर या जिनके द्वारा सत्-संख्या आदि आठ अनुयोगद्वारोंसे संयुक्त उपर्युक्त चौदह गुणस्थानोंका अन्वेषण किया जाता है वे मार्गणास्थान कहे जाते हैं। तं जहा ॥३॥ वे मार्गणायें इस प्रकार हैं ॥ ३ ॥ गइ इंदिए काए जोगे वेदे कसाए णाणे संजमे दंसणे लेस्सा भविय सम्मत्त सण्णि आहारए चेदि ॥ ४ ॥ गति, इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व, संज्ञी और आहार; ये वे चौदह मार्गणायें हैं ॥ ४ ॥ १ गति- जो प्राप्त की जाय उसे गति कहते हैं। अथवा, एक भवसे दूसरे भवमें जानेको गति कहते हैं । अथवा गतिनामक नामकर्मके उदयसे जो जीवकी अवस्थाविशेष उत्पन्न होती है उसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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