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________________ [ १०७ तीन गाथाओंके द्वारा गुणस्थानोंकी अन्तरप्ररूपणा की गई है, जब की वह षट्खण्डागममें १९ सूत्रोंके द्वारा वर्णित है । तदनन्तर कुछ प्रमुख मार्गणाओंकी अन्तर प्ररूपणा करके कहा गया है किभव-भावपरत्तीर्ण काल विभागं कमेणऽणुगमित्ता । भावेण समुवत्त एवं कुजं तराणुगमं ॥ २६३ ॥ प्रस्तावना अर्थात् अनुक्त शेत्र मार्गणाओंके भव और भाव - परिवर्तन सम्बन्धी काल-विभागको क्रम से अनुमार्गण करके भावसे समुपयुक्त ( अतिसावधान ) होकर इसी प्रकारसे शेष मार्गणाओंके अन्तरानुगमको करना चाहिए । भावप्ररूपणा जीवसमासमें केवल छह गाथाओंके द्वारा की गई है, जब कि षट्खण्डागमके जीवस्थानमें वह ९२ सूत्रोंमें वर्णित है । जीवसमासकी संक्षेपताको लिए हुए विशेषता यह है कि इसमें एक एक गाथाके द्वारा मार्गणास्थानों में औदयिक आदि भावोंका निर्देश कर दिया गया 1 यथा गइ काय त्रेय लेस्सा कसाय अन्नाण अजय असण्णी । मिच्छाहारे उदया, जियभव्वियर त्तिय सहावो ॥ २६९ ॥ अर्थात् गति, काय, वेद, लेश्या, अज्ञान, असंयम, असंज्ञी, मिथ्यात्व और आहारमार्गणाएँ औदयिक भावरूप हैं । जीवत्व, भव्यत्व और इतर ( अभव्यत्व ) ये तीनों स्वभावरूप अर्थात् पारिणामिक भावरूप हैं । जीवसमासमें अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा एक खास ढंगसे की गई है, जिससे षट्खण्डागमके प्रथम खण्ड जीवट्ठाण और द्वितीय खण्ड खुदाबंध इन दोनों खंडोंकी अल्पबहुत्वप्ररूपणाके आधारका सामंजस्य बैठ जाता है । अल्पबहुत्वकी प्ररूपणामें जीवसमासके भीतर सर्वप्रथम जो दो गाथाएँ दी गई हैं, उनका मिलान खुदाबंधके अल्पबहुत्वसे कीजिए जीवसमास-गाथा थवा नरा नरेहि य असंखगुणिया हवंति णेरइया । तत्तो सुरा सुरेहि य सिद्धाऽणंता तओ तिरिया || २७१ ॥ थोवाउ मणुस्सीओ नर-नरय - तिरिक्खिओ असंखगुणा । सुर- देवी संखगुणा सिद्धा तिरिया अणतगुणा ॥ २७२ ॥ खुद्दाबन्ध-सूत्र अप्पा बहुगागमेण गदियाणुवादेण पंच गदीओ समासेण ॥ १ ॥ सव्वत्थोवा मसा ॥ २ ॥ रइया असंखेज्जगुणा || ३ || देवा असंखेज्जगुणा ॥ ४ ॥ सिद्धा अनंतगुणा ॥ ५ ॥ ( खुदाबंध- अल्पब. पृ. ४५१ ) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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