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________________ १०६] छक्खंडागम मार्गणास्थानोंके स्पर्शनकी प्ररूपणा की गई है । गुणस्थानोंकी स्पर्शनप्ररूपणा जीवसमासमें डेढ़ गाथामें कही गई है, जब कि षट्खण्डागममें वह ९ सूत्रोंमें वर्णित है । दोनोंका मिलान कीजिए जीवसमास-गाथामिच्छेहिं सव्वलोओ सासण-मिस्सेहि अजय-देसेहिं । पुट्ठा चउदसभागा बारस अट्ठट्ठ छच्चेव ॥ १९५ ।। सेसेह ऽ संखभागो फुसिओ लोगो सजोगिकेवलिहिं । षट्खण्डागम-सूत्रओघेण मिच्छादिट्ठीहिं केवडियं खेत्तं फोसिदं ? सव्वलोगो ।। २ ॥ सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेजदिभागो॥३॥ अट्ठ बारह चोदस भागा वा देसूणा ॥ ४ ॥ सम्मामिच्छाइट्ठि- असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेतं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ५ ॥ अट्ठ चोद्दस भागा वा देसूणा ॥ ६ ॥ संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेजदिभागो ॥ ७ ॥ छ चौदस भागा वा देसूणा ॥ ८ ॥ पमत्तसंजदप्पडडि जीव अजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेजदिभागो। सजोगिकेवलीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेजदिभागो असंखेज्जा वा भागा सव्वलोगो वा ॥ १० ॥ (षट्खं. पृ. १०१-१०४) ____ कालप्ररूपणा करते हुए जीवसमासमें सबसे पहले चारों गतिके जीवोंकी विस्तारके साथ भवस्थिति और कायस्थिति बताई गई है, क्योंकि उसके जाने विना गुणस्थानों और मार्गणास्थानोंकी काल-प्ररूपणा ठीक ठीक नहीं जानी जा सकती है। तदनन्तर एक और नाना जीवोंकी अपेक्षा गुणस्थानों और मार्गणास्थानोंकी कालप्ररूपणा की गई है । गुणस्थानोंकी प्ररूपणा जीवसमासमें ७॥ गाथाओंमें की गई है तब षटखण्डागममें वह ३१ सूत्रोंमें की गई है । विस्तारके भयसे यहां दोनोंके उद्धरण नहीं दिये जा रहे हैं। जीवसमासमें कालभेदवाली कुछ मुख्य मुख्य मार्गणाओंकी कालप्ररूपणा करके अन्तमें कहा गया है एत्थ य जीवसमासे अणुमग्गिय सुहुम-निउणमइकुसले । सुहुमं कालविभागं विमएज सुयम्मि उवजुत्तो ॥ २४० ॥ अर्थात् सूक्ष्म एवं निपुण बुद्धिवाले कुशल जनोंको चाहिए कि वे जीवसमासके इस स्थलपर श्रुतज्ञानमें उपयुक्त होकर अनुक्त मार्गणाओंके सूक्ष्म काल-विभागका अनुमार्गण करके शिष्य जनोंको उसका भेद प्रतिपादन करें । ___ अन्तर प्ररूपणा करते हुए जीवसमासमें सबसे पहले अन्तरका स्वरूप बतलाया गया है पुन: चारों गतिवाले जीव मरण कर कहां कहां उत्पन्न होते हैं, यह बताया गया है । पुनः जिनमें अन्तर सम्भव है, ऐसे गुणस्थानों और मार्गणास्थानोंका अन्तरकाल बताया गया है। पश्चात् Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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