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________________ प्रस्तावना [९३ भवदि ॥ २० ॥ एवं संसरिदूण अपच्छिमे भवग्गहणे अधो सत्तमाए पुढवीए णेरइएसु उववण्णो ॥ २१ ॥ तेणेव पढमसमयआहारएण पढमसमयतब्भवत्थेण उक्कस्सेण जोगेण आहारिदो ॥ २२ ॥ उक्कस्सिमाए वड्डीए वड्डिदो ॥ २३ ॥ अंतोमुहूत्तेण सव्वलहुं सव्वाहि पज्जत्तीहि पज्जत्तयदो ॥२४॥ तत्थ भवट्ठिदी तेत्तीस सागरोवमाणि ॥ २५ ॥ आउअमणुपालेतो बहुसो बहुसो उक्कस्साणि जोगट्ठाणाणि गच्छदि ॥ २६ ॥ बहुसो बहुसो बहुसंकिलेसपरिणामो भवदि ॥ २७ ॥ एवं संसरिदूण थोवावसेसे जीविदव्यए त्ति जोगजवमज्झस्सुवरिमंतोमुहुत्तद्धमच्छिदो ॥ २८ ॥ चरिमे जीवगुणहाणिहाणंतरे आवलियाए असंखेज्जदिभागमच्छिदो ॥ २९ ॥ दुचरिम-तिचरिमसमए उक्कस्ससंकिलेसं गदो ॥ ३० ॥ चरिम-दुचरिमसमए उक्कस्सजगिं गदो ॥ ३१ ॥ चरिमसमय तब्भवत्थस्सणाणावरणीयवेयणा दव्वदो उक्कस्सा ॥ ३२ ॥ ( प्रस्तुत ग्रन्थ ५४१-५४५ ) इसी वेदना-अनुयोगद्वारके भीतर ज्ञानावरणादि कर्मोकी जघन्य द्रव्यवेदनाका स्वामी क्षपितकौशिक जीव बतलाया है । इसका स्वरूप षटखंडागममें २७ सूत्रोंकेद्वारा बतलाया गया है, जब कि वह कम्मपयडीमें केवल ३ गाथाओंमें है। पाठक इन दोनोंकी भी तुलना करें कम्मपयडी-गाथा १ पल्लासंसियभागेण-कम्मठिइमच्छिओ निगोएसु । सुहुमेसुऽभवियजोगं जहन्नयं कटु निग्गम्म ॥ ९४ ॥ २ जोग्गेसुऽसंखवारे सम्मत्तं लभिय देसविरइं च । अट्ठक्खुत्तो विरइं संजोयणहा तइयवारे ॥ ९५॥ ३ चउरुवसमित्तु मोहं लहुँ खवंतो भवे खवियकम्मो । पारण तहिं पगयं पडुच्च काओ वि सविसेसं ॥९६॥ छक्खंडागम-सूत्र जो जीवो सुहुमणिगोदजीवेसु पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागेण ऊणियं कम्मट्ठिदिमच्छिदो ॥ ४९ ॥ तत्थ य संसरमाणस्स बहुवा अपज्जत्तभत्रा, थोवा पज्जत्तभवा ॥ ५० ॥ दीहाओ अपज्जत्तद्धाओ, रहस्साओ पज्जत्तद्धाओ ॥ ५१ ॥ जदा जदा आउअं बंधदि तदा तदा तप्पाओग्गुक्कस्स जोगेण बंधदि ।। ५२ ॥ उवरिल्लीणं ट्ठिदीणं णिसेयस्स जहण्णपदे, हेट्ठिल्लीणं ट्ठिदीणं णिस्सेयस्स उक्कस्सपदे ॥ ५३ ।। बहुसो बहुसो जहण्णाणि जोगट्ठाणाणि गच्छदि ॥ ५४ ॥ बहुसो बहुसो मंदसंकिलेसपरिणामो भवदि ॥ ५५ ॥ एवं संसरिदूण बादरपुढवि जीवपज्जत्तएसु उववण्णो ॥ ५६ ॥ अंतोमुहुत्तेण सव्वलहुं सव्वाहि पज्जत्तीहि पज्जत्तयदो ॥ ५७ ॥ अंतोमुहुत्तेण कालगदसमाणो पुवकोडाउएसु मणुसेसुववण्णो ॥५८॥ सव्वलहुं जोणिणिक्खमणजम्मणेण जादो अट्ठवस्सिओ ॥ ५९॥ संजमं पडिवण्णो ॥ ६० ॥ तत्थ य भवट्ठिदि पुवकोडिं देसूणं संजम मणुपालइत्ता थोवावसेसे जीविदव्वए त्ति मिच्छत्तं गदो ॥ ६१ ॥ सव्वत्थोवाए मिच्छत्तस्स असंजमद्धाए अच्छिदो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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