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________________ अनेकान्त 72/3, जुलाई-सितम्बर, 2019 87 आएगा? तब तो विज्ञान ही काम आएगा; लेकिन आचार्य कहते हैं कि जिनवाणी का एक अक्षर भी परम्परा से मोक्ष का कारण बनता है, क्योंकि वह आत्मिक विज्ञान है। जैन कर्म सिद्धान्त और विज्ञान- जैन दर्शन कर्म को केवल एक भावात्मक संस्कार नहीं कहता है, बल्कि भौतिक (पौद्गलिक, जड़ात्मक, रासायनिक, जैन रासायनिक) संस्कार (संश्लेष बंधन संयोग) भी मानता है। जिस समय में जीव अज्ञान, ईर्ष्या, काम-क्रोधादि के वशीभूत होकर मन, वचन या काय से कार्य करता है, उस समय जीव के सम्पूर्ण आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है, उस परिस्पंदन से आकर्षित होकर सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त कर्म वर्गणायें आकर्षित होकर आती हैं। इसको कर्मास्रव कहते हैं। यह कार्मण वर्गणा भौतिक (पौद्गलिक परमाणुओं के समूह स्वरूप) होती हैं। राग-द्वेषादि कषाय भाव से आकर्षित हुई कर्म वर्गणायें आत्मा के असंख्यात प्रदेश में संश्लेष रूप से मिल जाती हैं, इसको कर्मबंध कहते हैं। जैसे धन विद्युत् एवं ऋण विद्युत् से आवेशित होकर लौहखण्ड, चुंबक रूप जब परिणमन करता है, तब स्वक्षेत्र में स्थित योग्य लौहखण्ड को आकर्षित करता है, उसी प्रकार राग (धनात्मक आवेश, आसक्ति, आकर्षण) द्वेष (ऋणात्मक आवेश, विद्वेष, विकर्षण) से आवेशित होकर जीव भी स्वयोग्य कार्मण वर्गणाओं को आकर्षित करके स्वप्रदेश में संश्लेष रूप से बांधता है। जैन कर्म सिद्धान्त सम्पूर्ण रूप से आधुनिक मनोविज्ञान है, कर्म के संस्कार आत्मा से किस तरह जुड़ते हैं, कषाय युक्त प्रवृत्तियों का मन पर किस तरह असर पड़ता है, इनका विवेचन हमें जैन धर्म सिद्धान्त ग्रन्थों से मिलता है। आधुनिक मनोविज्ञान में निरूपित 14 मूल प्रवृत्तियाँ हैं, वे मोहनीय कर्म के 28 प्रकृतियों के परिवार में पूरी तरह फिट हो जाती हैं। जितने भी मानसिक विकार हैं, वे मोह की संतान हैं। आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती द्वारा रचित गोम्मटसार ग्रंथ में कर्म सिद्धान्त को पूर्णतः गणितीय रूप में प्रस्तुत किया है, जिसे जैन कर्म सिद्धान्त का एक सर्व विकसित स्वरूप कहा जाता है।
SR No.538072
Book TitleAnekant 2019 Book 72 Ank 07 to 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaikumar Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year2019
Total Pages100
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size2 MB
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