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अनेकान्त 72/3, जुलाई-सितम्बर, 2019 उसके शुद्ध कायोत्सर्ग होता है। कायोत्सर्ग में संलग्न साधक चिंतन करता है कि मैं देव, मनुष्य, तिथंच तथा अचेतनकृत समस्त उपसर्गों को शांत चित्त से सहन करता हूँ। मुनि के लिए यह नियम है कि वह कायोत्सर्ग में धर्म तथा शुक्ल ध्यान का ही चिंतन करे। कायोत्सर्ग के काल में प्राणवायु को शरीर के भीतर प्रविष्ट करके, उसे आनंद से विकसित हृदयकमल में रोककर, जिनेन्द्र मुद्रा के द्वारा महामंत्र णमोकार का ध्यान करना चाहिए। मंत्र के दो-दो तथा एक-एक अंश को पृथक्-पृथक् चिन्तन करके अन्त में उस प्राणवायु को धीरे-धीरे बाहर निकालना चाहिए। इस प्रकार नौ बार प्रयोग करने वाले के चिरसंचित महान् कर्मराशि भस्म हो जाती है। प्राणायाम में असमर्थ साधक वचनों के द्वारा भी उस मंत्र का जाप कर सकता है, परन्तु जाप अत्यंत धीमे स्वर में होना चाहिए, जिससे उसे कोई न सुने। आचार्यों का यहां स्पष्ट कथन है कि वाचनिक और मानसिक कायोत्सर्ग में महान् अंतर है। दण्डों के उच्चारण की अपेक्षा सौ गुणा पुण्य संचय वाचनिक जाप में होता है और हजार गुणा मानसिक जाप में।15 कायोत्सर्ग के योग्य दिशा और क्षेत्र
पाचीणोदीचिमुहो चेदिमहत्तो व कुणदि एगते।
आलोयणपत्तीयं काउसग्गं अणाबाधे॥' अर्थात् साधक को कायोत्सर्ग में बैठने के पहले दिशा और क्षेत्र का ध्यान इस प्रकार रखना चाहिए। साधक को उत्तर दिशा की ओर मुँह करके अथवा आराध्य देव की प्रतिमा की ओर मुँह करके स्वकृत दोषों की आलोचना के लिए कायोत्सर्ग करता है। कायोत्सर्ग सर्वदा एकान्त स्थान में, अबाधित स्थान में अथवा जहां किसी का आना-जाना न हो ऐसे अमार्ग स्थान में करना चाहिए। कायोत्सर्ग के काल का प्रमाण
कायोत्सर्ग प्रतिदिन एवं अवसरानुसार भी किया जाता है। उत्कृष्ट कायोत्सर्ग का काल एक वर्ष तथा जघन्य काल अंतर्मुहूर्त है तथा शेष कायोत्सर्ग दिन-रात्रि आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। मूलाचार में अवसरानुसार कायोत्सर्ग के काल का प्रमाण इस प्रकार निर्धारित किया है।