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अनेकान्त 69/1, जनवरी-मार्च, 2016 लगभग 55 पृष्ठ नमूने के रूप में मुद्रित कराये थे। भारतवर्ष में इस प्रकार का कार्य सर्वप्रथम बंगाल की एशियाटिक सोसायटी के माध्यम से प्रकाश में आया। 1877 ई. में राजेन्द्रलाल मित्र ने 'ADescriptive Catalogueof Sanskrit Manuscripts in the Library of the Asiatic society of Bengal' कलकत्ता से प्रकाशित किया था, जिसमें कुछ प्राकृत तथा अपभ्रंश ग्रंथों के नाम भी मिलते हैं। मुख्य रूप से महत्वपूर्ण कार्य का प्रारंभ इस देश में भण्डारकर के प्रकाशित 'A List of Sanskrit Manuscripts in private Libraries in the Bombay Presidency' ग्रंथ से माना जाता है। इसी श्रृंखला में सुपार्श्वदास गुप्त द्वारा सम्पादित ACatalogue of Sanskrit, Prakrit and Hindi Works in the Jaina Siddhant Bhawan, Arrah' (1919 ई.) एवं दलाल और लालचन्द गांधी द्वारा सम्पादित 'A Catalogue of Manuscripts in Jaisalmer Bhandrars' Pichals आरियंटल सीरीज, बड़ौदा (ई. 1923), रायबहादुर हीरालाल, ACatalouge of Sanskritand Prakrit Manuscripts in theC.P.and Barar', नागपुर, 1926 आदि उल्लेखनीय है। आधुनिकतम खोजों के आधार पर इस दिशा में कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ-सूचियों का निर्माण हुआ जिनमें एच. डी. वेलणकर का 'ACatalogue of Prakrit Manuscripts', जिल्द 3-4 बम्बई (1930 ई.) तथा 'जिनरत्नकोश' पूना (1944 ई.) हीरालाल रसिकदास कापडिया का 'Descriptive Catalougue of Manuscripts in the Govt. Manuscript Lib.', भण्डारकर ओरियंटल रिसर्च इन्स्टीट्यट. पूना (1954 ई.), डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल का "राजस्थान के जैन शास्त्र-भण्डारों की ग्रंथ-सूची', भा. 1-5 तथा मुनि विजयजी के 'A catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts in the Rajasthan Oriental Research Institute, Jodhpur Collection' ya que fauteuil के पाटन के जैन भण्डारों की ग्रंथ-सूचियाँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। अपभ्रंश के जैन ग्रंथों की प्रकाशित एवं अप्रकाशित हस्तलिखित ग्रंथों की सूची के लिए देवेन्द्रकुमार शास्त्री की भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित पुस्तक "अपभ्रंश भाषा और साहित्य की शोध प्रवृत्तियाँ" विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनमें अपभ्रंश से संबन्धित सभी प्रकार का विवरण दिया गया है। जर्मन विद्वान वाल्टर शब्रिग ने सर्वप्रथम जैन हस्तलिखित ग्रंथों