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अनेकान्त 63/1, जनवरी-मार्च 2010
दळ्टठयाए सासया भावटठयाए असासया।.......... .....भगवतीसूत्र, 7/3/273 अनेकान्त, स्याद्वाद और सप्तभंगी, डॉ. सागरमल जैन, पृ.12-13 वही, पृ. 13 अनेकान्त, स्याद्वाद और सप्तभंगी, डॉ. सागरमल जैन, पृ. 63 स्याद्वाद और सप्तभंगीनस्य, डॉ. भिखारीराम यादव, पृ. 63 पझणवणिज्जा भावा, अनंतभागो तु अण्णभिलप्पणं। पण्ण्वणिज्जाणं पण, अनंतभागो सुदविबद्ध.............विशेषावश्यक भाष्य, गा.35 अनेकान्त, स्याद्वाद और सप्तभंगी, ....... पृ. 8 जैनदर्शन स्वरूप और विश्लेषण, देवेन्द्रमुनि, पृ. 234 उदधाविव सर्वसिन्धव समदीर्णास्त्वयिद्रष्टयः। न च तासु भगवन् प्रदृश्यते अविभक्तासु सरित्यिसववादेधिः।।.........सिद्धसेन जैनदर्शन स्वरूप और विश्लेषण, देवेन्द्रमुनि, पृ. 234 से उद्धृत धर्मदर्शन मनन और मूल्यांकन, देवेन्द्रमुनि, पृ. 163 अनेकान्त है तीसरा नेत्र, महाप्रज्ञजी, पृ. 82 एकनाकर्षन्ति श्लथयन्ति वस्तुतत्त्वमितरेण अन्तेन जयति जैनी मितिर्मन्थाननेत्रमीव गोपी..........पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, श्लो. 225 अनेकान्त है तीसरा नेत्र, आ. महाप्रज्ञ, प्रस्तुति अनेकान्त, स्याद्वाद और सप्तभंगी, डॉ. सागरमल जैन, पृ... जेण विण लोगस्स वि ववहारो सव्वहा ण णित्वडइ तस्स भुवणेक्क गुरूणों णमो अणेगंत वायस्स...........सन्मति तर्क प्रकरण, 3/70
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