SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 45
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रबुद्ध श्रावक -डॉ० सुरेशचन्द्र जैन लोक में सभी साधना करते हैं। चाहे वह साधना योग की हो या भोग की। जो योग साधना कर आत्म-कल्याण करते हैं वे लोकोत्तर कहलाते हैं और जो भोगोपभोग साधना में रमे रहते हैं वे जिस किसी तरह समय-यापन कर संसार से विदा हो जाते हैं। जैन धर्म में अतिवाद को कभी प्रश्रय नहीं दिया गया। यद्यपि योगी होना परम लक्ष्य है तथापि उसमें शक्ति के अनुसार त्याग और तप करने की प्रेरणा की गई है, आडम्बर जोड़ने की नहीं। ___ आज चारों ओर भोग संस्कृति का बोलबाला है। आयातित भोग प्रधान पाश्चात्य संस्कृति का सर्वत्र प्रभाव दृष्टिगत है। परिणाम स्वरूप दिशाहीन अमर्यादित आचार-विचार के दर्शन आसानी से किये जा सकते हैं। कुल व धर्म की मर्यादायें नित्यप्रति धूल-धूसरित हो रही हैं। विषय-वासना में स्वच्छन्द भाव से संलग्न गृहस्थ श्रावक की स्थिति शोचनीय तो है ही, उससे भी अधिक शोचनीय स्थिति साधुवर्ग की हो गई है। दिगम्बर परम्परा में साधु का विशिष्ट स्थान है। परमेष्ठी के रूप में मानकर उसकी नवधा भक्तिपूर्वक आराधना की जाती है। आचार्य समन्तभद्र ने साधुचर्या को लक्ष्य करके स्पष्ट कहा है विषयाशा वशातीतो निरारम्भो परिग्रहः । ज्ञान ध्यान तपो रक्तः तपस्वी स प्रशस्यते।।-रत्नकरण्डश्रावकाचार विषय आशा से दूर, आरम्भ परिग्रह से रहित ज्ञानध्यान में लीन तपस्वी प्रसिद्धि को प्राप्त होता है। साधु और श्रावकों की आगमनिष्ठ चर्या में निरन्तर हास की स्थिति सर्वानुगत है। साथ ही वर्तमान में विधि-विधानों और सामूहिक पूजा-पाठों की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है जो शुभ है, परन्तु जिन-मन्दिरकों के स्थान पर इस प्रवृत्ति ने गृहस्थ श्रावकों के घरों में भी स्थान लेना प्रारम्भ कर दिया है और जब - शेष आवरण पृष्ठ ४ पर.....
SR No.538052
Book TitleAnekant 1999 Book 52 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1999
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy