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(क) संपादक ने पाठ-भेद संग्रह किये और अपनी समझ से जो
उन्हें उचित जान पड़ा उस पाठ को रखा : अर्थात् किसी
प्रति को आदर्श नहीं माना । (ख) हम नहीं समझे कि जब प्राकृत शब्द के रूपभेद में अर्थ
भेद न होता हो, तब प्राकृत शब्द रूपो के चयन में संपादक ने प्रसंग को कैसे देखा ? अर्थात् पुग्गल हो या पोग्गल हो दोनों शब्द रूपों के अर्थ में अभेद है - इससे प्रसंग और अर्थ दानों में अन्तर नहीं पड़ता – तब प्रमंग से शब्द चयन कैस किया और कैस जाना कि यहां पागल है या पुग्गल आदि ।
(ग) उन्होंने शन्द्ध- चयन में ग्रन्थकार कदकुद के अभिप्रेत को
कैसे जाना कि कंदकंद ने अमक स्थान पर अमुक शब्द का अमुक रूप रखा है ? जबकि कुन्दकन्दाचार्य की स्व दस्त लिखित कोई प्रति है ही नहीं और जब सपादक स्वयं ही लिखित और मुद्रित प्रतियो को मृत्ल युक्त कह रहे हैं। प्राकृत शब्द रूपां के चयन में सपादक ने अमृतचन्द्र आचार्य के मन्तव्य का कहां से जान लिया जबकि प्राकृत शब्द रूप के विषय में उक्त आचार्य मौन हैं और कंवल संस्कृत में
व्याख्याकार हैं। (च) संपादक का यह कथन कि उन्होंने "जयमन के मंतव्य को
स्वीकार किया" भी सर्वथा मिथ्या है क्योंकि उन्होंने विभिन्न गाथाओं में जयसेनाचार्य द्वारा प्रयुक्त विभिन्न शब्द रूपों में पाठ की औचित्यता देखन की विद्वता दिखाई और जहां इन्हें औचित्यता नहीं दिखी वहां शब्द-रूप बदल दिया - ऐसा
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