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________________ २२, वर्ष ४३, कि० ३ प्रनेकान्त समक्ष प्रस्तुत करते हुए इन काव्यों में श्रमण संस्कृति का अमर्त विषय से प्रभावित होकर नायिका समस्त मोह निर्वाह किया गया है। श्रमण संस्कृति से परिचित कराना विलासों का परित्याग कर तप मार्ग का अनुसरण करने इन जैन सन्देश काव्यों का दूसरा उद्देश्य है। मेघदूत के लगती है । क्षमावान होने के कारण नायक अपने मार्ग में सदश ही इन काव्यों में भी सन्देश प्रेषित किया गया है। आई हर बाधा को दूर कर देता है तथा अपने लक्ष्य की परन्तु इनके सन्देशों में विरहव्यवस्था एवं वियोग शृंगार प्राप्ति कर लेता है। परमार्थ तत्व का विश्लेषण करते हुए के साथ-साथ आध्यात्मिकता को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। बताया गया है कि जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष है। केवल नायक-नायिका को आध्यात्मिक उन्नति का सन्देश देते यही एक सत्य है। शेष सभी सांसारिक सुख असत्य हैं। हए सांसारिक चीजो के प्रति मोह को दूर करता है । अत: प्रकृति चित्रण के अन्तर्गत इस अध्याय में प्रकृति को इस अध्याय में जैन सन्देश काव्यो के सन्देशों का विवेचन विभिन्न रूपों में प्रदर्शित किया गया है। आवलम्बन, करते हए वणित सन्देशों के स्वरूप को बताया गया है। उद्वतेपन, मानवीकरण, संश्लिष्ट, उपदेश एव नामपरिविशेषतः इन काव्यों में वणित सन्देशो में आध्यात्मिकता गणन आदि सभी रूपों में जैन कवियों ने प्रकृति का का पुट मिलता है। नायिका के विरह सन्देश को भी कवि चित्रण किया है। ने आध्यात्मिक सन्देश की महत्ता को दशनि हेतु हो चतुर्थ अध्याय में जैन सन्देश काव्यों की शैलीगत प्रस्तत किया है। प्रकृति का प्रतीव सजीव चित्रण यहाँ विशेषताओं का अध्ययन किया गया है। अन्तरंग एवं उपलब्ध है। इसी अध्याय के अन्तर्गत जैन सन्देश काव्या बहिरग दोनों ही दष्टि से विभाजित कर काव्य तत्वो का में प्रयुक्त सूचित पदो को भी दर्शाया गया है । इस प्रकार विश्लेषण किया गया है। अन्तरग तत्त्वों के विश्नेषण द्वितीय अध्याय मे जैन सन्देश काव्य परम्परा का निवाह में रस, ध्वनि एवं गणीभत व्यग्य का विवेचन है। करुण करते इए जैन सन्देश काव्यो के ग्रन्थो का परिचय, संक्षिप्त का पारचय, साक्षप्त एवं शांत रस दोनों का वर्णन इन काव्यों में किया गया कथा, उद्देश्य, सुभाषित, सन्देश एवम् प्रकृति चित्रण को है। गुणीभूत व्यंग्य के प्रान्तर्गत प्रगढ व्यंग्य मन्दिग्ध प्रस्तुत किया गया है। प्रदान व्यङ्ग्य, असुन्दर व्यङ्ग्य एव अस्फुट व्यङग्य का तृतीय अध्याय में जैन सन्देश काव्यों की काव्यगत विवेचन किया गया है । ध्वनि का भी इस अध्याय में पूर्ण विशेषताओं का उल्लेख किया है। इस अध्याय में सत्य, रूपेण विवेचन किया गया है। नेष, उपमा, उत्प्रेक्षा, क्षमा, त्यागादि आध्यात्मिक मूल्यो का विश्लेषण कर काव्यो यमक आदि अलङ्कारों की सुन्दर योजना की गई है। की पथक्ता एवं मौलिकता को दर्शाया गया है। मोह माधुर्य, औज एवं प्रसाद आदि गुणों को भी इस अध्याय विलासो से दर इन काव्यो का नायक सत्यादि मूल्यों का में FORT किया गया है। ति योग पालन करते हए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करता है। लक्षण, लक्षणा, रूढि लक्षणा एव व्यन्जना शक्ति प्रादिको मध्य स्वरूप को जैन कवियो ने सच बोलने की अपेक्षा भी स्पष्ट किया गया है। मन्दाक्राता छन्द मे निराद्ध कुछ जीवन के वास्तविक सत्य मोक्ष के रूप मे प्रतिपादित श्लोकों के उदाहरण को इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया किया है। नायक सत्यवादी तो है ही साथ ही साथ जीवन है। के चरम सत्य को भी भली भाति जानता है। सत्य के पचम अध्याय मे पात्रों का चरित्र-चित्रण प्रस्तुत है। समान ही क्षमा, दया, अहिंसा आदि तत्वों को भी विशेष चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ये जैन सन्देश काव्य अपना स्थान प्राप्त है। इसके अतिरिक्त परमार्थ को इन काव्यों पृथक् महत्व रखते हैं। पार्श्वनाथ जैसे महान चित्रण को मे विशेष महत्व दिया गया है। सत्यादि तत्वों का स्पष्ट चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्त शम्बर, नैमिकुमार, रूप नायक के व्यक्तित्व मे स्पष्ट झलकता है। अमूर्त राजुलमति, स्थूलभद्र, कोशा, विजयर्माण एवं वसुन्धरा के विषयो को मतं रूप मे दर्शाना इन काव्यों के कवियो की चरित्र को भी चित्रित किया गया है। पाश्र्वनाथ, नेमिबदि चातर्य का प्रतीक है। शीलदूत काव्य मे शोल जैसे कुमार एवं स्थूल भद्र का चरित्र एक महान "ष के रूप
SR No.538043
Book TitleAnekant 1990 Book 43 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1990
Total Pages144
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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