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पं० शिरोमणिवाल धर्मसार सतसई" कबहूं नहिं सीकर तन उपज्यं पुण्य फल ॥३२ दोहा-वसु राजा यह मूठ तें, गिरत न लागी वार । चौपाई-यात जानि दया हिय धर,
राय युधिष्ठिर सत्य तें, पहुंचे मोक्ष द्वार ॥४३॥ हिसां वणिज सदा परिहर । अथास्तेयानुव्रत-अधिक वस्तु जो पर की लेइ, हिंसा कर्म कर बहु पाप,
पर कों घाटि आपु जो देह। परभव जाय लहै संताप ॥३३॥
परी वस्तु के विसरी (भूली) होय, हिंसा कर्म
पाती अनधरी है सोइ ॥४॥ दोहा-लाख लीलि रंग आदि दै सनु सबनु मंह विद्य।
झूठी करी करै नर कोइ, सोरा (डा) सीसो लोह विष मनु वनिज ए निंद्य ॥३४
यह सब चोरी जानो लोइ । चांवल तिली जु संग्रहै, नाज लेव अधिकार ।
चोरी कर धर्म सब जाइ, गोधन बहुत जो राखिक, हिंसा बढ़े अपार ॥३५
दुर्गति दुख मिले तिहि आइ ॥४५॥ कंद जरै बहु खोदि के, करै तेल अरु क्वाथ ।
याही जन्म वध वन्धन लहै, धातु मारि गुटिका कर,(रचे) पाप लेह निज हाथ ॥३६
राजदण्ड पुनि निश्चय सहै। चौपाई-कुआं बावड़ी ताल बंधाई,
देह खंड अपकीरत जानि, खाई खोद अरु बाग लगाइ।
अवर दुख को कहै बखानि ॥४६॥ खेती करी अरु लाद बैल,
अथ मरहठा छंदए सब जानो दुर्गति गैल ॥३७॥ जो कीरति गोप, धर्म विलोप, कर महा अपराध । ए सब जीव दया के पोख,
जो शुम गति तोर दुर्गति लोर, जोर युद्ध उपाधि । तजि कुवंज (कुवणिज) मन धर संतोष । जो संकट आने दुर्गति ठान, वध वन्धन को गेह। जो भवि जीव दया मन राख,
सब ओगुण मंडित, गहै न पंडित, सो अल्ल (अलभ्य)प्रथम अणुव्रत यह जिन साख ॥१८॥
धन एह ॥४७॥ दोहा-अरविंद राय हिंसा करी, नरक सहे दुख जाइ। चौपाई-चोरी आनी वस्तु न लेई, मातग दया जो मन धरी, सुरपति बन्दो आय ||३९
चोरी को उपदेश न देई। अब सत्याणुव्रत-कठिन वचन पर निन्दा होइ,
इह विधि चोरी त्याग जवहिं, झूठी बात कही मति कोइ ॥४०॥
तृतीय अणुव्रत पावै तबहिं ॥४॥ हित मित सत्य रही प्रमाण,
दोहा-चोरी ते तापस गए वध बन्धन लही जु शोक । सुर नर माने जाते आन ।
अंजना चोर चोरी तजी, सुदेव भयो सुर लोक ॥ve जैसे भानु विराजे भोर,
अथ ब्रह्मचर्याणुव्रत-विषय सत्ताइस इन्द्रियनि केरे, सत्य सुजस प्रकट चहुं ओर ॥४१॥
अरु मन तें उपज बहुतेरे । अथ कवित्त पावक तं जल होय, वारिधि तें थल होय,
विकार अनेक तजै जब और, सस्त्र से कमल होय, ग्राम होय वन तें।
सो यह शील जगत सिरमौर ॥१०॥ कूप तें विवर होय, पर्वत तें घर होय ।
परदारा जब त्यागै ग्रही, वासव तें दान होय, हितु दुर्जन तें।
चौथो अणुव्रत पावै सही। सिंह तें कुरंग होय, व्याल श्याल अंग होय ।
मातु बहिन पुत्री सम चित्त, विष तें विदुष होय, माला अहि फन तें।
परदारा तुम जानहु मित्र ॥५॥ विषम तें सम होय, संकट न व्याप कोय ।
अथवा सापनि सी मनधरी, एते गुण होय सत्यवादी के दरस तें॥४२॥
दुख की बानि दूर परिहरी।