________________
१०, वर्ष ३८ कि.३
अनेकान्त
परिवार का वर्णन है। वह स्वयं दीक्षित होकर क्षुल्लक रोग ग्रसित होही रेवती रानी के द्वार आयो । रानी ने पद धारण करता है। संयोगवश वही क्षुल्लक मथुरा की परिगाहो (पृ. २५ क)। यात्रा की तैयारी करता है और अपने गुरु से मथुरा के ब्रह्मचारी ने अहारु ले करि नवनु करि, दुर्गन्धी उपलोगों को समाचार भेजने हेतु जब वह निवेदन करता है जाही, घर के सब भजि गऐ, रानी पछाताप कर जागी, तब गुरु ने वहां के मुनिराज सुव्रत को वन्दना-नमस्कार मैं कुभोजन दीनी, मुनि नैं दुष पायो। कहकर रानी रेवती से कुशल क्षेम पूछते हुए वापस रानी की परीक्षा लेकरि : ब्रह्मचारी में अपनी सम्पू सौटने को कहा किन्तु वहां के एक प्रमुख भट्टारक भव्यसेन कीनों गुरु की धर्म विधि कही : (पृ. २५) के विषय में गुरु ने कोई चर्चा तक न की जबकि वह रानी रेवनी कथा : इहां संपूरन भी, ब्रह्मचारी गुल्लक मुनि भव्य सेन को एक महान साधक मानता क्षुलक गुरु पास आयो : राजा नै रेवती रानी ने दिव्या रहा था। इसी प्रसंग को लिपिकार ने समकालीन हिन्दी लीनी, अस्त्री लिंगु छेदि देय भयो (पृ० २६ क)। में इस प्रकार अंकित किया है:
उक्त हिन्दी प्रकरण में लिपि एवं भाषा सम्बन्धी "अमूदत्त गुन कथा, मेघकूट नगु, ससिपहु, राजा, कुछ विशेषताएं इस प्रकार दृष्टिगोचर होती हैं :रानी सुमई, ससिसेहर बेटा को राजु दीनों, आपु ब्रह्म- १-प्रतिलिपि में प्रयुक्त हिन्दी-गद्य ब्रज भाषा का चारी भऐ।
पूर्वरूप है। कहीं-कही बुन्देली शब्दावली का भी प्रयोग धाविकाओं की ही चर्चा है तथा बारहवी सन्धि में श्रावक- मिलता है।
ब्रह्मचार सौ गुरु ने कही कि सुव्रत नाम मुनि सौं २-विषय प्रसंग की समाप्ति के समय पूर्ण विराम वन्दना भक्ति कहने : रेवती रानी सो समाचार पूछने के स्थान पर के आकार के एक विन्दु का प्रयोग किया अभव्यसेन मटारक कौं कछु कहो नाही॥"
गया है जो अग्रेजी फुल स्टाप के समान है। इसी प्रकार इसी प्रकार क्षुल्क जब मथुरा पहुचता है और वहां किसी एक प्रकरण की समाप्ति पर समाप्ति सूचक चिन्ह वह जो कुछ करता है उसे हिन्दी में इस प्रकार अङ्कित दो विन्दुओं का प्रयोग मिलता है जो अंग्रेजी के कोलन' किया गया है :
से मिलता-जुलता है । यद्यपि आम दोनों नियमों में कहीं"मत मनि सौ वन्दना कही। भव्यसैनि को मिल्यो, कहीं अपवाद भी मिलते हैं। कही कि तुम में पढ़ने आयो ही। मौको पड़ावो । वहि 3 और Lore नमिकों चले । हरी भूमि उपजाई, परिक्षा लेतु है : एक नुबता अथवा छोटा बिन्दु दिया हुआ है । यथा- कमंडल को पानी विद्या करि दूरि कीनौ : एक व (वन (वमन) रेवती (रेवती)। (१० २३ क) पोपरि उपाई । जीवशासि, तामै सौच ४ 'ख' के लिए सर्वत्र 'ष' का प्रयोग मिलता है। पवित्र भऐ, ब्राह्मन पुत्र नै प्रभव्यसेनि नामु धरी (पृ० जैसे दुषु (दुख) पोपरि (पोखरि)। २३ ख)।"
५-रकार पर ह्रस्व या दीर्घ उकार उसको पार्व पहल ब्रह्मरूपु कीनो : दूज नरराइन रूपु कीनो तीजे में न जोड़कर नीचे जोड़ा गया है। जैसे-रपु (रूपु सरप महादेव रूपु कीनों, चौथें तीर्थंकर सांमिग्री सहित (सरूपू)। कीनी (पृ. २४ क)
६-यकार सर्वत्र पकार जैसा है। ब्रह्मचारी नै चारि सरूप कीन, भव्यसेनि आदि सब
७-एकार के स्थान पर सर्वत्र ऐकार प्रयुक्त है। नग्र लोक देखन भाऐ, रेवती न आई (पृ. २४ ख)। यथा-भऐ, गए, हऐ।
ब्रह्मचारी आदिदेव हो गए। नौ नराइन . ग्यारह ५-दीर्घ ईकार के स्वतन्त्र प्रयोग पर उसकी रेफ रुद्र हो गए, तीर्थंकर चौबीस हो गए, अब कोई पाषडी को नीचे तक खींचा गया है । यथा-आही सुमड़ी। आयो है : रेवती रानो आही नाही। पाछै ब्रह्मचारी व
(क्रमश:)