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भ० महावीर जन्मस्थान विषयक विचार
अस्तु, विद्वत्समुदाय की अधिकांशतः यह धारणा से यह बात प्रगट है।" तदनन्तर श्वेताम्बर मुनि कल्याण आई है विदेहदेश (उत्तरी बिहार) की महानगरी वैशाली विजयजी ने अपनी पुस्तक "श्रमण भगवान महावीर" का ही एक सन्निवेश उपनगर अथवा नातिदूर स्थित नगर (पृ. २५) मे इसी मत की पुष्टि की और "आजकल" गा अथवा नातिदूर स्थित नगर ही भगवान महावीर की "आधुनिक" क्षत्रियकुण्ड (अर्थात लछाड) विषयक नवीन जन्मभूमि कुण्डपुर (कुण्डग्राम वा क्षत्रियकुण्डग्राम) था। मान्यता का खण्डन किया । श्वेताम्बराचार्य विजयेन्द्रमूरि प्राचीन जैन साहित्य मे भगवान का एक विशेषण ने १९४६ ई. मे प्रकाशित अपनी पुस्तक "वैशाली" में "वैशालिक" भी प्राप्त होता है-इससे भी उपरोक्त पर्याप्त ऊहापोह करके अन्त मे (पृ. ४०-४१) लिखा हैनिष्कर्ष की पुष्टि है। हेमचन्द्राचार्य ने एक स्थान पर "यह स्पष्ट है कि प्रान्तिवशलिच्छुआड के निकट पर्वत के उक्त नगर को "सिद्धार्थपुर भी कहा है। यतिवृषभ ने ऊपर के स्थान को क्षत्रियकुण्ड मान लिया गया है। यहां "कुण्डल" और पट्ख हागम के वेदनाखण्ड में 'कुण्डलपुर' भगवान का कोई भी कल्याणक-चवन, जन्म और दीक्षानाम रूप मिलते है ।
नही हुआ। शास्त्रो के अनुसार हमारी यह सम्मति है कि वर्तमान गती के द्वितीय दशक तक वर्तमान बसा के
जो स्थान आजकल बमाढ नाम से प्रसिद्ध है वही प्राचीन के साथ प्राचीन बैशाली का समीकरण प्राय. सुनिश्चित वैशाली है। दमी के निकट क्षत्रियकुण्डग्राम था जहां हो चका पा । सुनने में तो यह भी आया है कि उत्तरी भगवान के तीन कल्याणक हुए थे। डा. जगदीशचन्द्र जैन बिहार के छपरा आदि जिलो के जैन उक्त स्थान को ने भी अपनी पुस्तक "भारत के प्राचीन जैन तीर्थ" (बनाजन्मभूमि मानकर वहा पहले भी जाते-आते रहे है। रम, १९५२, पृ० २८-२६) में लिखा है कि "मुजफ्फरपुर किन्तु तीसरे दशक से उसका प्रभूत प्रचार भी हुआ। जिले के बगाढ ग्राम को प्राचीन वैशाली माना जाता है। जिसमें पटना के इन्जीनियरिंग कालेज के प्रो० अनन्तप्रसाद वैशाली के पास कुण्डपुर नाम का एक नगर था। यहा जैन लोकपाल छपरा के श्री कन्हैयालाल मरावगी प्रभनि महावीर का जन्म हुआ था । कुण्डपुर क्षत्रिय कुण्डग्राम कई सज्जनो ने विशेष योग दिया। शनै शनैः वैशाली और ब्राह्मण कुण्डग्राम नामक दो मोहल्लो मे बटा था। बिहार नाम से बनाढ़ में एक जैन धर्मशाला तथा महावीर कुण्डपुर में ज्ञातृ ण्ड नाम का सुन्दर उद्यान था। महावी. जिनालय का निर्माण हुआ। स्व. माहू शान्तप्रमादजी की न दीक्षा ग्रहण को यो । आधुनिक वसुकुण्ड को कुण्डपुर प्रेरणा एव दानशीलता के फलस्वरूप वहा बंगाली जन माना जाता है।" म्यानकवानी आचार्य हस्तीमल्लजी के अहिमा एवं प्राकृत शोध सम्थान की स्थापना हुई। प्रति ग्रथ "जैन धर्म का मौलिक इतिहाम-प्रथम भाग (जयवर्ष भगवान महावीर जयन्ती उत्सव भी वहा निर्यात पुर, १९७१ पृ० ३५०.३५२) मे तथा प० बनभद्र जन रूप में मनाया जाने लगा। बसान मे लगभग पांच कि० को "भारत के दिगम्बर जैन तीर्थ-द्वितीय भाग" मी० की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित एक स्थल के (बम्बई, १६७५ पृ० ३६.४२) मे भी नालन्दा वाले कुण्डलसाथ वसुकुण्डपुर का समीकरण करके वहा भगवान के पुर और लिछाड वाले क्षत्रियकुण्ड, दोनो को ही आधुजन्मस्थान के अतिभव्य स्मारक का शिलान्यास भी ममा- निक एवं भ्रान्ति मान्यताएं सिद्ध किया है, तथा बसाढ़ रोह पूर्वक हो चुका है।
(वैशाली) के कुण्डपुर को ही जन्मस्थान सूचित किया है। अनेक पाश्चात्य एव भारतीय जनेतर विद्वानो के अन्य अनेक विद्वानो का भी यही अभिमत है। अतिरिक्त ब्र० शीतल प्रसाद जी ने १९२२ ई० मे प्रका- गत नवम्बर ८४ में मधुबन (णिबर जी) मे आयोशित अपनी पुस्तक "बिहार, बगाल, उड़ीमा के प्राचीन जित तथाकथित सेमीनार में यह विवाद पुन: उठाया गया जैन स्मारक" (पृ. २८) मे स्पष्ट लिखा था कि "इसी और लछाड़ का पूरा समर्थन किया गया । किन्तु उसकी वैशाली मे जो कुण्डग्राम है वही श्री महावीर स्वामी का सिोर्टो एवं प्रतिक्यिाओं को देख से तो नहीं लगता कि जन्म स्थान है। वहां पर तीर्थंकरो की मूर्तियों के निकलने इस विवाद का निवेड़ा हो गया है।