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________________ श्रमण संस्कृति एवं उसकी प्रमुख विशेषताएं 0 सुरेन्द्रपाल सिंह, प्रवक्ता इतिहास विभाग श्रमण संस्कृति के विषय में कुछ लिखने से पूर्व यह हो सकता। वह ध्र वतारे की तरह सदैव चमकता रहेगा। जानना आवश्यक हो जाता है कि संस्कृति किसे कहते हैं। श्रमण संस्कृति :किसी समाज की रचना उसके आन्तरिक आचार संगठन भारत वर्ष मे दो संस्कृतियों की प्रधानता रही है। पर निर्भर करती है। संस्कृति को उस समाज की आचार जिनके सयुक्त रूप को भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। संहिता कह सकते हैं, क्योकि संस्कृति के बिना समाज- इन संस्कृतियों के नाम हैं-२. श्रमण संस्कृति तथा २. रचना की कल्पना नहीं की जा सकती । संस्कृति समाज वैदिक संस्कृति । वैदिक संस्कृति और श्रमण संस्कृति की पथ-प्रदर्शिका होती है । संस्कृति समाज तथा व्यक्ति समानान्तर रूप से प्रवाहित होती रही है और इनको एक को समुन्नत बनाती है और उसको दोष मुक्त करती है। दूसरे की पूरक कहा जा सकता है। श्रमण संस्कृति के तपप्राकृतिक विधान के अनुरूप संस्कार की हुई पद्धति ही स्वियो को श्रमण मुनि तथा वैदिक संस्कृति के तपस्वियों संस्कृति है । किसी भी देश की संस्कृति जस देश के धर्म, को संन्यासी, ऋषि आदि नामों से सम्बोधित किया जाता दर्शन, विचार, संगीत कला आदि पर आधारित होती है। रहा है। इन्ही विविध रूपों द्वारा संस्कृति अपने को अभिव्यक्त श्रमरण शब्द का अर्थ :-श्रमण शब्द का प्रयोग करने में समर्थ होती है। भारत की प्राचीन संस्कृति इस जैन मुनियों एवं बौद्ध भिक्षुओं दोनों के लिए ही किया देश के निवासियों की कृति में निहित है । भारतीय मनी- जाता रहा है । जो श्रन करता है, कष्ट सहता है अर्थात् षियों की अविरल साधना का प्रतिफल ही भारतीय तप करता है वह तपस्वी श्रमण है । जिसके मन में संस्कृति है। दर्शन, काव्य, कला, भाषा, शिक्षा और शिल्प समता की सुरसरिता प्रवाहित होती है, वह न किसी से आदि संस्कृति के अंग हैं। द्वेष करता है न किसी से राग करता है, अपितु अपनी संस्कृति का अर्थ संस्कार सम्पन्न जीवन है। वह मनः स्थिति को सम रखता है वह श्रमण कहलाता है।' जीवन जीने की कला है, पद्धति है। वह आकाश में नहीं, श्रमण वह है जो पुरस्कार के पुष्पों को पाकर प्रसन्न नहीं धरती पर रहती है, वह कल्पना में नही जीवन का ठोस होता और अपमान के हलाहल को देखकर खिन्न नहीं सत्य है । बुद्धि का कुतुहल नहीं किंतु एक आदर्श है। होता, अपितु सदैव मान और अपमान में सम रहता है। संस्कृति एक ऐसा विराट् तत्त्व है, जिसमे सभी कुछ उतराध्ययन में कहा है "सिर मुंडा लेने से कोई श्रमण समाविष्ट हो जाता है। मानव जीवन के ज्ञान, भाव और नही होता किंतु समता का आचरण करने से ही कार्य यह तीन पक्ष हैं जिसे दूसरे शब्दों में बुद्धि, हृदय और श्रमण है।' व्यवहार कहा जा सकता है । इन तीनों तथ्यों का जब इस प्रकार जैन संस्कृति की साधना समता की पूर्ण समन्वय होता है तब संस्कृति का जन्म होता है। साधना है । समता समभाव, समदृष्टि एवं साम्य भाव ये संस्कृति मानव-जीवन का सौन्दर्य है, सौरभ है, संस्कृति सभी जैन संस्कृति के मूल तत्व हैं । निघण्टु में श्रमणका बीवन का मिठास है, गरिमा है। जितनी संस्कृति अपनाई अर्थ नग्न दिगम्बर ही किया गया है। यथाजायेगी उतना ही जीवन महान बनेगा । जिस समाज और "श्रमणा दिगम्बराः श्रमणा वातरशना (वसना)" राष्ट्र की संस्कृति प्राणवन्त है, उसका कभी विनाश नहीं -भूषण टीकायाम इति निषष्ट ।
SR No.538038
Book TitleAnekant 1985 Book 38 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1985
Total Pages138
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size7 MB
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