________________
जायकुमारचरित की सूक्तियों और उनका अध्ययन
१३. इह को सुस्थिउ को दुत्थियउ ।
अन्याय मे अर्जन, कठोर वचन, तथा दण्ड की कठोसयलुवि कम्मेण गलात्थिउ ॥
रता का त्याग करना चाहिए । इस संसार में कौन सुखी और कौन दुखी है ? सभा २४ अकुलीणु वि थीरयणु ल इज्जइ। कर्मों की विडम्बना में पड़े हैं।
अकुलीन को भी स्त्रीरल ले लेने में कोई दोष नहीं है। १४. छोइ समुज्जवेण सुसहाएं परिसिय छत्तहयगया। २५ सुद्धचित वेस वि कुल उत्ती। ३,७,१.. अलसंतेग पिसुण जण संगे णासइ राय सपया। शुद्धचित्त वेश्या भी कुलपुत्री है।
३, २, दुवई २६ जुत्ताजुत्तउ गुरुयणु जाणई। भली भांति उद्यम करने से एवं सन्मित्र के सहयोग से सिसु दिग्गउ पेसगु संमाणइ ।। ही छत्र, अश्व और हाथियो से सहित राज-सम्पत्ति योग्य अयोग्य गुरुजन जानते हैं, शिशु तो उनकी आज्ञा . उत्पन्न होती है तथा आलस्य करने और नीच पुरुषों का सम्मान ही करते हैं। की संगति से वह नष्ट हो जाती है।
२७ अबरु कुमतिमत हय सोतहो । १५ ते वुरढा जे सुवण सुलक्खरण सत्यकम्म विषएसु मइ विवरीय होइ सायत्तहो । वियक्खण ।
कुमत्री के मत्र से जिसके कान भर जाते हैं उस वृद्ध वे ही हैं जो सज्जन और सुलक्षण होते हुए स्वच्छन्द व्यक्ति की मति विपरीन हो जाती है। शास्त्र और कर्म सम्बन्धी विषयो में प्रवीण हो। २८ कामाउरहिं कि ण किर दिज्जइ।
किर दिज्ज। ३,१०,६ १६ विणए इदियजउ संपज्जइ।
कामातुर मनुष्य क्या नहीं दे सकते। विनय से इन्द्रियो पर विजय प्राप्त होती हैं। २६ महिलउ उ मुणति सहियत्तण, १७ दुट्ठदो परिपालणु जहिं किज्जइ
महिलई गुण सहाउ वकतणु ॥ ३, ११, ३ सो अहम्मु जहिं साहु वहिज्जइ ॥३२, १६ महिलाएं स्वयं अपने हित को नही जानती, टेढ़ापन अधर्म वह है जहां दुष्ट का परिपालन और साधु का महिलाओ का स्वाभाविक गुण है। वध किया जावे।
३. जासु अत्थु सो जाइ बियारहि। ३,११,१ १८ ण मिलइ रायलच्छि अहगारछो। ३, २, ११ जिसके धन है वही विवार को प्राप्त होता है। पापी को राजलक्ष्मी नहीं मिलती।
३. महिलई जडवण हैं धणुहीणह दीइ दुल्लहु ।३,१३ पत्ता १९ घरमें विणु ण अत्थु साहिज्जइ। १,२, १३ महिलाओ जड पुरुषो एवं हीन तथा दीन जनों को धर्म के बिना अर्थसिद्धि नहीं होती।
धन दुर्लभ है। २० उवसग्गु वि हवंतु णासिज्जइ। ३, ३, १० ३२ गुणवतउ माणुसु भल्ला ।
३,१३ पत्ता विघ्न उत्पन्न होते ही उसका विनाश करना उचित है। गुणवान् मनुष्य ही भला होता है। २१ परियणु दाणे संतोसिज्जइ।
३, ३,१० ३३ सिरि लंहडह णत्यि कारुण्णउ । ३, १५, ३ परिजनों को दान से संतुष्ट करे ।
लक्की लम्पटो के करुण नहीं होती। २२ मुयसु णिसीह कुपरिसह संगमु
३४ घरधम्मु धरिज्जउ जिग्गहेण । होइ तेण भीषण वसणागमु ॥३, ३, १३ लोहस्य पमाण परिग्गहेण ॥ कुपुरुषों की संगति छोड़ो, उससे भयंकर व्यसनों का लोभ-निग्रह और परिग्रहप्रमाण द्वारा ही गृहधर्म आगमन होता है।
धारण किया जाता है। २३ मज्जु विलासिरिणउ मिगमारण जूया रत्तणु । ३५ जो मइरा चक्सह आमिसु भक्खइ, गुरु कुदेवह लग्गह।
पणदूसणु मुयहि णिट्ठर वयणु दंड फरसत्तणु ॥३,३ पत्ता सोमाणउ गट्टउ, पह पन्भट्टउ, पाव भीस५ दुम्गह। मय, विलासिनी स्त्रिया, आखेट, यूतानुराग, धन का
४.२पत्ता