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२८, बर्ष ३८, कि०४
अनेकान्त सूक्तियां भी इस चरित में उपलब्ध हैं (६१-६६)। इनमें -: रणायकुमारचरि उसे संकलित सूक्तियाँ :जीवन सुधार सम्बन्धी सकेतो का समावेश है।
१.सिद्धि उपहउ सीयलु होइ मेहु मनुष्य की, धन-पिपासा कैसे शान्त हो? इस हेतु सक्तियों में कहा गया है कि अर्थसिद्धि का कारण धर्म है।
२. भणु कि ण पुण्यवतहो कियउ
२, १४,६ धर्म से ही पापो का क्षय तथा नाना प्रकार की संपत्तियां
कहो ! पुण्यदान के लिए क्या नहीं किया जाता? होती है (१६, ५२, ५३)। वह धर्म कौन सा है ! ३.णिद्दइवहो सुहि वकइ वयणु २, १४, १० जिससे ऐमा होता है, इस प्रश के समाधान हेतु नीतियों
निर्दयी मनुष्य से मित्र भी मुंह फेर लेता है। मे अहिंसामयी धर्म को प्रधानता दी गयी है (४७)। इस
४. दइवेण कालसप्पु वि सयणु २, १४,१. प्रकार जीवन मे धर्म के महत्व का प्रतिपादन कर कवि ने
भाग्यवश काला नाग भी स्वजन बन जाता है। नीतियो की उपादेयता सिद्ध की है।
५. जसु जिणधम्मु मणे तहो, धर्म के सबंध में यह भी कटु सत्य है कि जाने बिना
दिणिजि विणेसुर वि णमंति णिरुत्तर २, पत्ता १३ वास्तविक रूप से धारण नहीं किया जा सकता है । जानना
जिसके मन मे जैनधर्म है उसे नित्य निश्चय से देव तभी संभव है जबकि जानने की शक्ति मोहावत न हो,
भी नमते हैं। क्योकि मोह ही वह है जो ज्ञानियों के ज्ञान को ढक देता
६. जह पावपसत्तहो सुहसहण, है, और मिथ्यादर्शन की ओर ले जाता है (७०-७१)।
दालिछिएण पावइ रयण
२,६,१७ अत: लगता है ऐसी सूक्तियों मे कवि की यही भावना
पापसक्त को दारिद्रय के कारण सुखदायी रत्न प्राप्त अन्तनिहित रही है कि लोग मोह से बचे।
नहीं होते। नीतिपूर्ण सूक्तियों में ऐसे तथ्यों को भी उद्घाटित
___७. जेण ण तव चरणू किउ दुहहरण, किया गया है जिनसे कि लोग सामान्य व्यवहार का
विसए ण मणु आउचिउ। कुशलता पूर्वक निर्वाह कर सकते है और परस्पर में प्रेम
अरुहि ण पुज्जियऊ, मलवज्जियउ, भाव बनाये रख सकते है। मनुष्यो के क्या कर्तव्य है ?
ते अप्पाणउ वंचिउ ।। २, पत्ता ६ (७), परिजनों को कैसे संतुष्ट किया जावे (२१), विघ्न के
जिसने दुखहारी तपश्चरण नहीं किया, विषयों से मन सम्बन्ध में योग्य परामर्श (२०) कुमत्री से क्यों बचें?
को नही खीचा एव दोष रहित अर्हन्त को नहीं पूजा (२७), लक्ष्मी लम्पटी और खल कैसे होते है ? (३३, ३६),
उसने अपने को ही ठगा है। क्षत्र का स्वभाव (३७), आदि ऐसे विषय हैं जिनसे जीबन
८.णव जोव्वणु ण सइ एइ जरा
२,४,५ सुखपूर्वक जीने के लिए निर्देश प्राप्त होता है। ऐसा भी
नव यौवन का नाश होता है और बुढ़ापा पाता है। कथन प्राप्त होता है कि तप यद्यपि कष्टमाध्य है परन्तु है
६. उप्पण्णहो दीसइ पुणु सरण
२, ४, ६, वह उपादेय ही हेय नही (५८)।
जो उत्पन्न हुआ है उमका पुनः मरण देखा जाता है। ___ अत: णयकुमारचरिउ की सूक्तियों के साक्ष्य में कहा कहा १०. अइसुंदररूवें रूउतहसइ
२,४ जा सकता है कि सूक्तियो के रूप मे जीवनोपयोग, कल्याण- एक सुन्दर रूप के आगे फीका पड़ जाता है। कारी दिशाबोधक बहुमूल्य सामग्री देकर कवि ने न केवल ११. वीरु वि संगामरंगि तसइ सूक्तिसाहित्य को समृद्ध किया है अपितु भारतीय बाङ्मय वीर पुरुष भी संग्राम में नास पाता है। की समृद्धि में भी चारचांद लगाये है।
१२. णियम णुसु अण्ण जि लोउ जिह । ऊपर कोष्ठको में दर्शायी गयी सूक्ति संख्याओ से णिणेहें दीसह पुणु वि तिह ॥ २,४,१ सम्बन्धित सूक्तियां मागे क्रमशः दी जा रही हैं। आशा है अपना प्रिय मनुष्य भी स्नेह के फीके पड़ने पर अन्य पाठकमाभान्वित होगे।
लोगों के समान साधारण दिखाई देने लगता है।