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________________ महाकवि रइधू कृत रिट्ठणेमिचरिउ में सोनागिर की भट्टारकीय गद्दी का उल्लेख डॉ. राजाराम जैन इतिहासरस्न, श्री सोनागिरि क्षेत्र बुन्देलखण्ड के तीर्थक्षेत्रों में अपना रिट्ठणेमि चरिउ एवं अपनी अन्य रचनाओं में उन्हें विविध प्रमुख स्थान रखता है। पहाड़ी पर निर्मित भव्य एवं विशाल विविध प्रसंगों में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक कई बार स्मरण किया जिन मन्दिर, प्राकृतिक सौन्दर्य, सुन्दर निर्झर एवं वनौष- है। शुभचन्द्र का समय बि० सं० १५०६ से १५३० के धियों से मिश्रित मधुर जल वाले सरोवरों से व्याप्त यह लगभग रहा है । अत: इसी काल में कनकाद्रि पर भट्टारपुण्यभूमि बरबस ही जन-मन मोह लेती हैं। कीय गद्दी की स्थापना की गई होगी, इसमें सन्देह नहीं। तीर्थभूमि होने के कारण उसका अपना महत्व तो रहा शुभचन्द्र नाम के कई भट्टारक साधक एवं विद्वान हुए ही किन्तु वि० स० की १५-१६वी मदी में साहित्यिक केन्द्र है, जिनके नाम साम्य के कारण उनके काल-निर्णय में बड़ी होने के कारण भी उसका विशेष महत्व रहा है। मुगलकाल उलझनें हुई है। किन्तु प्रस्तुत शुभचन्द्र भट्टारक के विषय मे राजनैतिक एवं धार्मिक उथल-पुथल होने के कारण में स्थिति अत्यन्त सुस्पष्ट है। भट्टारकों ने साहित्य लेखन तथा प्रचार-प्रसार के निमित्त यह तो ज्ञात नहीं हो पाया है कि भट्टारक शुभचन्द्र ने यत्र-तत्र अपने केन्द्र व्यवस्थित किए थे, जिन्हे भट्टारकीय कौन-कौन-सी रचनाएं लिखीं, किन्तु रइधू के उल्लेख के गहियों के नाम मे सभी जानते हैं । तोमरवशी राजाओ के आधार पर यह ज्ञात होता है कि वे परम सम्यक्त्वी, गुरु काल में भट्टारकों के कार्यकलापों का प्रमुख केन्द्र गोपाचल के प्रति अत्यन्त विनयशील, महातपस्वी, साहित्यकारों के था। नत्कालीन राजाओ ने भट्टारकों एवं जैन कवियो को लिए प्रेरणास्रोत तथा शिष्यों को अपने यहाँ आवास एवं विशेष प्रश्रय भी दिया था। राजा डूंगर सिंह के सम भोजनादि की व्यवस्था एवं अन्य सुविधाएं प्रदान करते थे, कालीन महाकवि रइधू ने सोनागिरि मे स्थापित हुई भट्टा [वही० १।२।१४-१५] रकीय गद्दी की सर्व प्रथम सूचना दी है तथा कहा है- महाकवि रइधू को शुभचन्द्र ने अत्यन्त स्नेहवश अपने "उत्तमक्षमा-गुण को धारण करने वाले तथा भव्य- निवास स्थान पर रखकर सभी सुविधोए प्रदान की थी जनों को संसार रूपी ससार से तारने वाले भट्टारक कमल- तथा उन्हे कुछ तात्त्विक ग्रन्थों का अध्ययन कराया था। HT तपस्वी श्री शन्ट ने काटि में रिट्ठणेमि परिउ की रचना तो शुभचन्द्र की कृपा के बिना एक भट्टारकीय गद्दी (पट्ट) की स्थापना की।" सम्भव ही नही थी। [वही० २४१२३।९-१२] मिचरित्र १२-१३] शुभचन्द्र काष्ठासंघ, माथुरगच्छ एवं पुष्करगण शाखा "भट्टारक शुभचन्द्र को रइधू ने अपने गुरु के रूप में के भट्टारक थे। अत: सोनागिर की भट्रारकीय गट्टी भी स्मरण किया है और कहा है कि "मैंने रिट्ठिणेमि चरिउ उसी परम्परा की थी। उसके अद्यावधि इतिहास की जानकी रचना भट्टारक शुभचन्द्र के श्री चरणो की सेवा एव कारी प्राप्त करने के लिए मैंने सोनागिर के वर्तमान भटासत्कृपावश ही की है।" रक महोदय, गोपाचल के कुछ प्रमुख व्यक्तियों एवं ग्वालियर [वही० १४१२३।९-१२] के पुरातत्त्व-विभाग से घना पत्र-व्यवहार किया, किन्तु भद्रारक शुभचन्द्र भट्टारक कमलकीति के दो शिष्यो में कही से कोई भी उत्तर मुझे नहीं मिल सका । यदि कछ से एक अन्यतम विद्वान एवं साधक शिष्य थे। रइधू ने (शेष पृ०७ पर)
SR No.538036
Book TitleAnekant 1983 Book 36 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1983
Total Pages166
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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