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भारतीय दर्शन की एक अप्रतिम कृति प्रष्टसहस्त्री
सिद्धि करता हुमा मिलता है। बौद्धदर्शन के पिता कहे हुए प्रा. वादिराज ने उसे सर्वज्ञ का प्रदर्शक और हस्तिजाने वाले प्रा. दिग्नाग ने भी अन्य के इष्टदेव तथा मल्ल ने सम्यग्दर्शन का समुत्पादक बतलाया है। उनके उपदेश (क्षणिकवाद) की स्थापना करते हुए इसमें दश परिच्छेद है, जो विषय-विभाजन की 'प्रमाणसमुच्चय' मे बुद्ध की स्तुति की है। इसी 'प्रमाण- दृष्टि से स्वयं ग्रन्थकार द्वारा अभिहित हैं। वह स्तवरूप समुच्चय' के समर्थन मे धर्मकीर्ति ने 'प्रमाणवातिक' और रचना होते हए भी दार्शनिक कृति है। उस काल में प्रज्ञाकर ने 'प्रमाणवातिकालंकार' नाम की व्याख्याएं दार्शनिक रचनाएं प्रायः पद्यात्मक तथा इष्टदेव की गुणलिखी हैं । पाश्चर्य नहीं कि समन्तभद्र ने ऐसी ही स्थिति स्तुति कप में रची जाती थी, बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की में प्रस्तुत 'देवागम' की रचना की है और उस पर माध्यमिक कारिका और विग्रहव्यावर्तनी, वसुबन्धु की प्रकलह देव ने धर्मकीर्ति की तरह 'देवागमभाष्य' (अष्ट. विज्ञप्तिमात्रता सिद्धि (विशतिका व त्रिशत्का), दिग्नाग शती) तथा विद्यानन्द ने प्रज्ञाकर की भांति 'देवागमा- का प्रमाण समुच्चय प्रादि रचनाएं इसी प्रकार की दार्शलङ्कार' (प्रस्तुत प्रष्टसहस्री) रचा है। 'देवागम' एक निक हैं और पद्यात्मक शैली में रची गयी हैं । समन्तभद्र स्तव ही है, जिसे प्रकलङ्क ने स्पष्ट शब्दों मे 'भगवत्स्तव' ने स्वयं अपनी (देवागम, स्वयम्भूस्तोत्र पोर युक्त्यनुकहा है। इस प्रकार 'देवागम' कितनी महत्त्व की रचना शासन) तीनों दार्शनिक रचनाएं कारिकात्मक और है, यह सहज में अवगत हो जाता है।
स्तुतिरूप में ही रची हैं। यथार्थ मे यह इतना अर्थगर्भ और प्रभावक ग्रन्थ है प्रस्तुत देवागम में भावकान्त-प्रभावकान्त, द्वेतकान्तकि उत्तरकाल मे इस पर अनेक प्राचार्यों ने भाष्य व्याख्या- अद्वतकान्त. नित्यकान्त-अनित्यकान्त, अन्यतैकान्त-मनन्यटिप्पण प्रादि लिखे है। प्रकलङ्कदेव की अष्टशती,
उल्लेख अपने 'प्रष्टसहस्री टिप्पण' (पृ. १) में विद्यानन्द की अष्टसहस्री और वसुनन्दि की देवागमवृत्ति
किया है । उनके इस उल्लेख से किसी अन्य देवागमइन तीन उपलब्ध टीकामों के अतिरिक्त कुछ व्याख्याए
व्याख्या के भी होने की सूचना मिलती है। पर वह पोर लिखी गयी हैं, जो प्राज अनुपलब्ध है और जिनके
भी प्राज अनुपलब्ध है। प्रकलदेव ने मप्टशती सकेत मिलते हैं । देवागम की महिमा को प्रदर्शित करते
(का० ३३ विवृति) में एक स्थान पर 'पाठान्तर १. '...स्तवो भगवतां देवागमस्तत्कृतिः।
मिदं बहुसंगहीतं भवति' वाक्य का प्रयोग किया है, अष्टश० मंग० प० २।
जो देवागम के पाठ-भेदों और उसकी अनेक व्याविद्यानन्द ने प्रष्टसहस्री (पृ. २६४) के अन्त में ख्यानों का स्पष्ट संकेत करता है। 'देवागम के प्रकलङ्क देव के समाप्ति-मङ्गल से पूर्व केचित्' शब्दों महत्त्व, गाम्भीर्य और विश्रुति को देखते हुए कोई के साथ 'देवागम' के किसी व्याख्याकार की प्राश्चर्य नहीं कि उस पर विभिन्न कालों में अनेक व्याख्या का 'जयति जगति' मादि समाप्ति- टीका टिप्पणादि लिखे गये हों। मङ्गल पद्य दिया है । और उसके बाद ही प्रकलङ्क ३. स्वामिनश्चरितं तस्य कस्य नो विस्मयावहम् । देब की अष्टशती का समाप्ति-मङ्गल नि है। इससे प्रतीत होता है कि प्रकलङ्क से पूर्व भी ४. देवागमनसूत्रस्य श्रुत्या सद्दर्शनान्वितः।-वि. को। 'देवागम' पर किसी प्राचार्य की व्याख्या रही है, ५. विद्यानन्द ने प्रकलङ्क के 'स्वोक्तपरिच्छेवे' (भ. जो विद्यानन्द को प्राप्त थी या उसकी उन्हें जान- श. का. ११४) शब्दों का अर्थ "स्वेनोक्ताः परि. कारी थी और उसी पर से उन्होंने उल्लिखित च्छेदा वश यस्मिस्तत् स्वोक्तपरिच्छेदमिति (शास्त्र) समाप्ति-मङ्गल पद्य दिया है। लघु समन्तभद्र (वि. तत्र' (प्र० स० पृ. २६४) यह किया है। उससे सं० १३वीं शती) ने प्रा. वादीभसिंह द्वारा 'प्राप्त- विदित है कि देवागम में दश परिच्छेद स्वयं समन्तमीमांसा' के उपलालन (व्याख्यान) किये जाने का मद्रोक्त हैं।
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