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________________ समय और हम लेखक-श्री जैनेन्द्र थी जैनेन्द्र जी हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार हैं। श्री प्रेमचन्द जी के उपरान्त उपन्यास और कहानियों के क्षेत्र में उन्हें सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। किन्तु 'जनेन्द्र के विचार'का अध्येता उन्हें उत्तम दार्शनिक माने बिना भी नहीं रहता। उत्तम इसलिए कि उनका वर्शन उनका मस्तिष्क-विलास नहीं, अपितु उनका अपना जीवन ही है। यह ही कारण है कि वे उसे सहजता के साथ रम्य शैली में अभिव्यक्त कर सके हैं। 'समय और हम' नामके अन्य में श्री वीरेन्द्रकुमार गुप्त के द्वारा पूछे गये ४५० प्रश्नों के उत्तर हैं। श्री जनेन्द्रजी ने उनमें से कतिपये मुझे सुनाए। मन रमा और रुचि तहीन हुई। यद्यपि जैनेन्द्र जी का अपना कोई पक्ष नहीं, किन्तु मुझे ऐसा लगा कि वे 'भनेकांत' से प्रभावित है-जाने या अनजाने । यह प्रस्थाभाविक भी नहीं । उनका किशोरावस्था का वातावरण ऐसा ही था। यह ग्रन्थ 'सर्वोदय ग्रन्थमाला' से प्रकाशित होने वाला है। बादा धर्माधिकारी भूमिका लिखेंगे। जैनेन्द्र जी ने कुछ अंश 'अनेकान्त' के लिए दिया है, एतदर्ष हम उनके मामारी हैं। -सम्पादक प्रश्न-आत्मा और परमात्मा के बीच अद्वैत के विषय क्या यह सच नहीं है कि दुश्मन मानकर हम किसी से लड़ में आपका क्या मत है? भी तभी सकते हैं, जब दोनों एक धरती पर हों। गाली उत्तर-अद्वैत हर दो के सर्वथा दो-पन का इन्कार तभी दी जा सकती और लगती है जब भाषा बीच में एक है। किन्हीं खास के आपसी दो-पन का नहीं। जिस तरह हो । लड़ते वक्त दुश्मनी से हम इतने भर जाते हैं कि एक जड़ और चेतन उसी तरह जीवात्मा और परमात्मा, उसी जमीन पर खड़े हैं, एक स्वार्थ पर अड़े है, यह याद नहीं तरह सत्य और असत्य, रूप-अरूप, साकार-निराकार रहता। अगर याद रहे तो दुश्मनी में भी अर्थ मिल जाए आदि जितनी द्वैत की कल्पनीय अवस्थाएँ है, अद्वैत में उन और बिल्कुल सम्भव है कि दुश्मनी रहने पर उसका दोस्ती सबका समाहार है । आपके प्रश्न को देखते हुए कहा जा से मेल हो जाए। अद्वैत की श्रद्धा से यदि हम द्वैतात्मक सकता है कि परम अद्वैत (परमेश्वर) जीव के साथ जिस जगत से निबटना सीखेंगे तो इसी संस्कारिता का उदय तरह एक है, उस तरह ही एक है जड़ के भी साथ । ईश्वर होगा। केवल द्वैत को ही मानकर उससे उलझेगे तो मूर्खता की परमता में द्वैत को अवकाश नहीं । द्वैत का स्थान हमसे से पार नहीं जा सकेंगे। न संस्कारों का उदय अपने बीच है । लेकिन वह सब चर्चा से अगम जो है सो उस तट से कर पाएंगे । कुत्ते को क्या इसीलिए कुत्ता नही कहा जाता इधर ही हमें बात को रखना चाहिए । आगे जाना डूब कि वह देखते ही दूसरे कुत्ते को गैर व दुश्मन समझता है। जाना है, वह बात से सम्भव नहीं है। यह दो-पन और परायापन देही को अनायास अनुभव होता प्रश्न-जीवन के व्यवहार में कदम कदम पर हमें है। किन्तु मनुष्य को यह प्राप्त है कि वह भिन्न में अभिद्वैत का सामना करना पड़ता है । ऐसी स्थिति में आपके न्नता भी मान सके । इसी दर्शन और साधना को, विकास अद्वैत का इस संसार में क्या स्थान है ? का मूल और मन्त्र मानना चाहिए । इस तरह अद्वैत से उत्तर - समझ के संसार में तो सचमुच कोई स्थान द्वित्वपूर्ण जगत के प्रति शक्ति ही कुछ प्राप्त होती है, बाधा नहीं है । अद्वैत के सम्बन्ध में जिसको 'समझना' कहा, वह नहीं। तो सम्भव ही नहीं है। पर अनुभूति और प्रतीति में, द्वत प्रश्न-क्या आस्तिकता का प्रचार करने की आवश्यसे जूझते हुए भी, भदैत अवश्य हमारे भीतर रह सकता है। कता है?
SR No.538015
Book TitleAnekant 1962 Book 15 Ank 01 to 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorA N Upadhye
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1962
Total Pages331
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size18 MB
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