SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 343
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २६४] अनेकान्त [किरण : साहित्यमहोगया और कितना ही साहित्य बैक- वह उपलब्ध हो जाय। कविने से प्रन्यको भाषाढ़ शुक्ला शास्त्रमयबारों में अमीदमा पदालिसके प्रकाश में बाने. त्रयोदशीको प्रारम्भ करके चैत्र कृष्णा प्रयोदशीको. की खास मान वही कारन है कि अपनश महीने में समास किया है। इस प्रन्यकी एक प्रति जयपुर भाषाका अभी तक कोई प्रामाणिक इतिहास सध्यार नहीं में मैने सं० १२३६ की खिली हुई सन् ४५ के मई महीनेकिया जा सका। अस्तु इस बेबमें निम्न अन्योंका परि. में देखी थी, और डाक्टर हीरालालजी एम.ए.टी. यरिया जाता है जो विद्वानोंबीरहिमे अभी तक मोमल बिटको इस प्रस्थकी एक प्रति सं. 11. में प्राप्त हई थे। उनके नाम इस प्रकार है-मिलाहचरित समय- पी। सम्भव भन्य प्रथमवहारोंमें इससे भी प्राचीन देव सम्भववाहचरिर और वरांगारिट कवि तेजपात प्रतियों उपलब्ध हो जायं। सुकमालचरिउके कर्ज मुनि पूर्णभद्र सिरिपाबचरिड और २. सम्भवणाहचरिउ सधके कर्ता कवि तेजजिनरतिक्या कर्ता कवि बरसेग, मिणाहरिर और मोनिशान और पास हैं, मो काष्ठासंघान्तर्गत माथुराम्वयके महारक चन्दप्पहरिउके कर्ता कवि दामोदर, भाराहवासारके सहस्रकीर्ति, गुणकीर्ति, पशाकीर्ति मजयकीर्ति और गुबकर्वाकवि वीर। भद्रकी परम्पराके विद्वान थे। यह महारक देहली, ग्वाधि पर, सोनीपत और हिसार भादि स्थानों में रहे हैं। पर वह १.णेमियाहचरिउ स प्रन्यके गर्ता कवि सम यह पह कहाँ था इस विषवमें प्रमी निश्चयतः कुछ नहीं परे है। इनका वंश पुरवार था और पिताका नाम रख कहा जा सकता है, पर उक्त पटके स्थान वही है जिनका पा रलदेव था । इनकी जन्मभूमि मानवदेश मन्तर्गत नामोल्लेख उपर किया गया है। कवि तेजपानने अपने गोगन्द नामक नगरमें बी, जहाँ पर अनेक उत्तुंग जिन- जीवन और माता-पितादिक तथा वंश एवं जाति प्रादिका मन्दिर और मै जिमाल भी था । वही पर कविने कोई समक्लेश नहीं किया। प्रस्तुत अन्धमें. सम्धियाँ पहले किसी व्याकरण प्रन्यका निर्माण किया था जो पुष- है जिनमें जैनियोंकि तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथजीका जीवन जों काठका पाभरण रूप , परन्तु वह कौनसा परिचय दिया हुआ है। इस प्रन्यकी रचना भादानक व्याकरण प्रन्य है, उसका कोई उल्लेख देखने में नहीं पाया देशके श्रीनगरमें दाउदशाहक राज्यकालमें की गई है। और न अभी तक उसके अस्तित्वका पता हो चला है। श्रीप्रमनगरके अग्रवाल वंशीय मित्तलगोत्रीय साहू गोमन्द नगर कहाँ बसा था. इसके अस्तित्वका ठीक पता बलमदेवके चतुर्थ पुत्र थीवहा, जिनकी माताका नाम नहीं चलता; परन्तु इतना जरूर मालूम होता है कि यह महादेवी और प्रथमपतीका नाम की और नगरी उज्जैन और मेलमा मध्यवर्ती किसी स्थान पर दूसरी पत्नीका नाम पासारही या, जिससे त्रिभुवनपाल रही होगी। कवि सश्मण उसी गोमन्द नगरमें रहते थे, और रणमस नामके दो पुत्र उत्पाहुए थे। थीमहाके पाँच विषयों के लिए प्रोत्साह वंशके तिजक, तथा भाई और भी थे, जिनके नाम बिसी, होल, दिवसी, 'रात दिन जिनवाणकरको पान किया करते थे। कवि मलिदास और कुन्थवास थे। ये सभी भाई और उनकी भाई अम्बदेव भी कषि थे, उन्होंने भी किसी अन्धकी संतान नकि उपासक थे। रचना की थी, उस प्रन्यका नाम, पारमाण मार रचना- बलमदेषके पितामह साह ने जिन विम्ब प्रतिष्ठा कालादिया था यह सब अन्वेषणीय।। मी कराई थी. उन्हींकज धीवदाके अनुरोधसे कवि कविवर समयकी एकमात्र कृति 'येमियाहचरिट जपावने कसम्भवनावपरितकी रचना की।प्रन्यमें ही ससमय उपबन्धजिसमें वियोंके बाईस वी- रचनाकाबका कोई सालमही,महारकी नामावली रमीकृपके पचेरे भाई भयवान नेमिनायका जीवन- जो उपर दी गई है उनमें सबसे बम्सिम नाम महारक परिचय दिया गया है । इस प्रथमें • परिषद या गुबमका है, जो महारक मायकीर्तिके शिष्य थे, और संधिया है, जिसके खोकॉजीमाबुमाविक संख्या १. सं.१९..केबाद किसी समय पह पर प्रतिक्षित हुए थे, है।यली मिस प्रशस्त्रिों का विवा म उनका सबब चिकमकी की सवादीका अन्तिम चरण मासम्मवीपम्पकी किसी अन्य प्राचीन प्रतिमें औरसोबाशवाणीका प्रारम्भिकबाम परवा। मलिदास और कुन्थदासात दिवसी, भी कवि थे, उन्होंने भी किसी
SR No.538012
Book TitleAnekant 1954 Book 12 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1954
Total Pages452
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size27 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy