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________________ किरण ७-८] युक्त्यनुशासनकी प्रस्तावना २७१ जाता है । अतः यह हेतु भी व्यभिचारी है, इससे महानता की, ज्ञानावरण-दर्शनावरण कर्मोका नाशकर बनन्त ज्ञान(आप्तता) सिद्ध नहीं होती। इसी तरह तीर्थकर होनेसे दर्शनरूप शुद्धिके उदयकी और अन्तराय कर्मका विनाश महानताकी बात जब सामने लाई गई तो आपने साफ कह कर अनन्तवीर्यरूप शक्तिके उत्कर्षकी चरम-सीमाको दिया कि 'तीर्थकर' तो दूसरे सुगतादिक भी कहलाते है प्राप्त किया है और साथ ही ब्रह्मपथके-अहिंसात्मक और वे भी संसारसे पार उतरने अथवा निर्वृति प्राप्त करने- आत्मविकासपद्धति अथवा मोक्षमार्गके वे नेता बने हैके उपायरूप आगमतीर्थके प्रवर्तक माने जाते है तब वे उन्होने अपने आदर्श एवं उपदेशादिद्वारा दूसरोंको उस सब भी आप्त-सर्वज्ञ ठहरते है, और यह बात बनती नही, सन्मार्ग पर लगाया है जो शुद्धि, शक्ति तथा शान्तिके परमो. क्योकि तीर्थङ्करोंके आगमोंमें परस्पर विरोष पाया जाता दयरूपमें आत्मविकासका परम सहायक है।' और उनके है। अतः उनमें कोई एक ही महान् हो सकता है, जिसका शासनकी महानताके विषयमें बतलाया है कि 'वह दया सापक तीर्थकरत्व हेतु नही, कोई दूसरा ही हेतु होना (अहिंसा), दम (संयम), त्याग (परिग्रह-त्यजन) और चाहिये। समाधि (प्रशस्तध्यान) की निष्ठा-तत्परता को लिये हुए ऐसी हालतमें पाठकजन यह जाननेके लिये जरूर है, नयों तथा प्रमाणोंके द्वारा वस्तुतत्त्वको बिल्कुल स्पष्टउत्सुक होंगे कि स्वामीजीने इस स्तोत्रमें वीरजिनकी महानता- सुनिश्चित करने वाला है और (अनेकान्तवादसे भिन्न) का किस रूपमें संद्योतन किया है। वीरजिनकी महानताका दूसरे सभी प्रवादोके द्वारा अबाध्य है-कोई भी उसके संद्योतन जिस रूपमें किया गया है उसका पूर्ण परिचय तो विषयको खडित अथवा दूषित करने में समर्थ नहीं है। पूरे ग्रन्थको बहुत दत्तावधानताके साथ अनेक बार पडने यही सब उसकी विशेषता है और इसीलिये वह अद्वितीय है।' पर ही ज्ञात हो सकेगा, यहां पर संक्षेपमें कुछ थोडा-सा ही अगली कारिकाओंमें सूत्ररूपसे वणित इस वीरशासनपरिचय कराया जाता है और उसके लिये ग्रन्थकी निम्न के महत्त्वको और उसके द्वारा वीरजिनेंद्रकी महानताको दो कारिकाए खास तौरसे उल्लेखनीय है - स्पष्ट करके बतलाया गया है--खास तौरसे यह प्रदर्शित त्वं शुद्धि-शारयोदयस्य काष्ठां किया गया है कि वीरजिन-द्वारा इस शासनमें वर्णित वस्तुतत्त्व तुला-व्यतीतां जिन ! शान्तिरूपाम् । कैसे नय-प्रमाणके द्वारा निर्बाध सिद्ध होता है और अवापिय ब्रह्मपयस्य नेता दूसरे सर्वथैकान्त-शासनोमें निर्दिष्ट हुआ वस्तुतत्त्व किस महानितीयत्प्रतिवक्तुमीशाः ॥४॥ प्रकारमे प्रमाणबाधित तथा अपने अस्तित्वको सिद्ध करमें क्या-वम-त्याग-समाधि-निष्ठ असमर्थ पाया जाता है। सारा विषय विज्ञ पाठकोंके लिये नय-प्रमाण-प्रकृताऽङजसार्यम् । बड़ा ही रोचक है ओर वीरजिनेंद्रकी कीतिको दिग्दिगन्तअघृष्यमन्यैरखिल. प्रवाब व्यापिनी बनानेवाला है। इसमें प्रधान-प्रधान दर्शनों और जिन! त्वदीयं मतमद्वितीयम् ॥६॥ उनके अवान्तर कितने ही वादोंका सूत्र अथवा संकेतादिकइनमेंसे पहली कारिकामें श्रीवीरकी महानताका और __ के रूपमे बहुत कुछ निर्देश और विवेक आ गया है। यह विषय ३६ वी कारिका तक चलता रहा है। श्री विद्यानन्दाचार्यने दूसरीमें उनके शासनकी महानताका उल्लेख है। श्री वीरकी इस कारिकाकी टीकाके अन्तमे वहा तकके वणित विषयमहानताको इस रूपमें प्रदर्शित किया गया है कि वे अतुलित की संक्षेपमे सूचना करते हुए लिखा हैशान्तिके साथ शुद्धि और शक्तिको पराकाष्ठाको प्राप्त . - स्तोत्रे युक्त्यनुशासन जिनपतेर्वोरस्य नि.शेषतः हुए हैं-उन्होंने मोहनीयकर्मका अभाव कर अनुपम सुख-शान्ति सम्प्राप्तस्य विशुद्धि-शक्ति-पदवी काष्ठा परामाश्रिताम् । २. अध्यात्म बहिरप्येष विग्रहादिमहोदयः । निर्गोतं मतमद्वितीयममलं सोपतोपाकृतं दिव्यः सत्यो दिवौकस्स्वप्यस्ति रागादिमत्सु सः ॥२॥ तद्बाह्य वितथ मतं च सकल सद्धीषनबुध्यताम् ।। तीर्थकृत्समयानां च परस्पर-विरोधतः । अर्थात्-यहांतकके इस युक्त्यनुशासन स्तोत्रमें सर्वेषामाप्तता नास्ति कश्चिदेव भवेद्गुरुः ॥३॥ शुद्धि और शक्तिको पराकाष्ठाको प्राप्त हुए वीरजिनेंद्रके -आप्तमीमांसा अनेकान्तात्मक स्याद्वादमत (शासन) को पूर्णतः निर्दोष
SR No.538011
Book TitleAnekant 1952 Book 11 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1952
Total Pages484
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size29 MB
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