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________________ अनेकान्त [वर्ष १० हां, तो इस तरह आत्मप्रदेशके पद्गल एक हैं इत्यादि। यह को या पुद्गलोंका गठन कुछ खास तरहके गठनमे गठित हो जाते हैं या हो ऐसा स्पंज समान कहीं नरम कहीं कड़ा ठोक-ठीक रहते हैं। इसी तरह सोचते हए जब हम और आगे श्रात्मप्रदेशकी शकलका या साइज-आकारका ऐसा बढ़े तो यह सोच विचार या ममझ सकते हैं कि बन जाता है और उसके अन्दर ठीक-ठीक फिट हो इस तरह ये पुद्गल गठित होकर किसी आत्म गया होता है कि जहाँ जहाँ यह पुद्गल मंगठन प्रदेशमें इस तरह मुगठित हो जाते है कि और जाता है आत्मा भी उमके माथ स्वयं स्वाभाविकत: दसरे पदगलोंके मुकाबले (comparison) मे उन- स्पन्जमे के पानी या नारंगीके रसके समान या की एक स्वयं स्वतंत्र सत्ता-सी हो जाती है, जैसे भीगे कपडमें वर्तमान पानीके समान अपने आप ले नदियों या झीलोंमे कंकड़ बन जाते है या समुद्रा- जाया जाता है। में मूगेके पहाड़ । ये कंकड़ या मूगेके पहाड़ स्वयं निर्जीव है पर बनते-बनते बन ही जाते है। हमने देखा है कि एक सूची तोरई तोरी या जैसे कोई स्पञ्ज हो और उसमें अन्दर सब जगह नेनुआं जिसे जगह-जगह अलग-अलग नामोंसे पानी ही पानी भरा हो और जहाँ जहाँ वह स्पञ्ज पुकारते हैं । या इमी किसिमकी जरदार कोई भी ले जाई जाए उसके अन्दरका पानी भी वहां वहां तरकारी या फलके अन्दरसे लेकर बाहर तक जाय। या कोई फल ले लीजिए जैसे नारंगी या एक तरहकी बड़ी भारी जर्रेदार बनावट या संतरा । संतरेमे रस तो सभी जगह मौजूद है पर जाला-सा होता है जो बड़ा ही मजबूत होता है और कुछ कड़ी सूखी चीजें रेशे या ज़रें भी है जो गारने यदि उसके अन्दर पानी भी डाल दिया जाय तो से निकलती है। पर यह रस और सूखी चीज इस स्पजके माफिक वह उसे ले जा सकता है। इसी तरह एक-दूसरमें मिले हैं कि साथ-साथ हो चलते तरह यह हलन-चलन होनस और पुद्गलोंमे है। एक और उदाहरण लीजिए, जैसे किसी गोल आपसमें स्कंध या संघ बनते रहने एक तरहकी गेंदके अन्दर हवा गैस या कुछ और चीजें भर दी मजबूत स्थिर-नहीं मिटने वाली या जैसी भी गई हों-ठोंक-ठोंककर एकदम ठसाठस-तो गेद- हो-बनावट या शकलका निमोण स्वयं आत्मको उछालनेपर सभी कुछ उसके साथ ही उद्धलेगा। प्रदेशके अन्दर होजाता है या हाता रहता है। इसे या यों समझ लीजिए कि शरीरके अन्दर खन ही हम कह सकत है कि यह पुद्गलाका बंध हुआ। पाकर कोई मांसपेशी वढ़ती जाती है-पर खन यह सचमुच ही आत्माको बांध-मा लेता है या उसके जर्रे-जरे में मौजूद रहता है-इससे हम कह बांध लेसकता है जैसा हम ऊपर कह आए हैं। सकते है कि वह मांसपेशी रक्तमय है या मैंने पहले भी कहा है कि अभी इस समय तक उस मांसपेशीमें मौजूद सारा रक्त मांसप- (यह लेख लिम्बनेके समय तक) मेरे दिमागमे शीमय है। अथवा जैसे कपड़ेको हम पानी- कोई ऐसे मौज या ठीक दृष्टान्त या उदाहरण नहीं में भिगो दें तो पानी और कपड़ा साथ-साथ झलके जिन्हें मैं विषयको समझानेके लिए अकेला ही रहेगे जबतक कपड़ेसे पानी निचोड न दिया या एकदममे ददृ । पर फिर भी आशा है कि लोग आय । या यों समझिए कि कोई चीज है जिसके इस बातको समझ जायेंगे । जैसे जब किसी पक्षीका चारों तरफ मकड़ीने जाला बुन दिया-या घरकी वीर्य मादाके गभमें जाता है तब उसके चारों तरफ औरतें जैसे छोटे-छोटे मोती या गुरियां (छोटे-छोटे और उसके अन्दर अपने आप बनाबट तैयार शीशेके पोत) के अन्दर किसी चोजको छिगा देता होने लगती है और बाहर भी एक कड़ी चीज बन
SR No.538010
Book TitleAnekant 1949 Book 10 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1949
Total Pages508
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size30 MB
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