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________________ प्रा० विद्यानन्दके समयपर नवीन प्रकाश (न्यायाचार्य पं० दरबारीलाल जैन, कोठिया ) wwsar प्राचार्य विद्यानन्द ने अपने किसी भी प्रन्थमें मोमांमक विद्वानोंके मिद्धान्नोंका विद्यानन्दने नामो अपना ममय नहीं दिया। अतः उनके ल्लेख और विना नामोल्लेखके अपने प्रायः सभी ममयपर प्रमाणपूर्वक विचार किया जाता है। ग्रन्थोंमें निरमन किया है। कुमारिल भट्ट और प्रभा. १. विद्यानन्दने न्यायदर्शनप्रणेना अक्षपाट गौत- करका ममय इसाकी मातवीं शताब्दी (ई० ६२५ मं मके न्यायसूत्र, न्यायसूत्रपर लिखे गये वात्स्यायनके' ६८०) है । अन. विद्यानन्द उनके (ई० मन ६८० के) न्यायभाष्य और न्यायमन्त्र तथा न्यायभाष्यपर ग्चे पश्चाद्वर्ती हैं। गये उद्योनकरके न्यायवानिक, इन तीनोंका तत्त्वा ४. कणादके वैशेषिकमत्र, और वैशेषिकसूत्रपर लोकताकि किसानों लिखे गये प्रशस्तपादके' प्रशस्तपादभाष्य तथा प्रशनामोल्लेखपूर्वक और बिना नामोल्लेबके भी सुवि स्तपादभाष्यपर भी रची गई व्योमशिवाचार्यकी म्तन समालोचन किया है । उन्योतकरका समय ६०० व्यशेमवती टीकाका विद्यानन्दने अापपरीक्षा इ० माना जाता है। अतः विद्यानन्द ई० मन के आदिमें आलोचन किया है। व्योमशिवाचार्यका पूर्ववर्ती नहीं हैं। ममय ई. सनकी मातवीं शताब्दीका उत्तरार्ध (ई. ६५० मे ७०० नक) बतलाया जाता है। अतः ____२. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक ( पृ० १०,४२७) और विद्यानन्द ई० मन ७०० के पूर्ववर्ती नहीं हैं। अष्टसहस्री (पृ० २८४) आदि ग्रन्थों में विद्यानन्दने प्रसिद्ध वैयाकरण एवं शब्दानप्रतिष्ठाता भन ह. ५ धर्मकीर्ति और उनके अनगामी प्रज्ञाकर तथा रिका नाम लेकर और बिना नाम लिये उनके 'वाक्य- धर्मोत्तरका अष्टमहसी (प्र. ८१,१२२,२७८), प्रमापदीय' प्रन्थकी अनेक कारिकाओंको उदधत करके गणपरीक्षा (पृ०५३), गापरीक्षा (पृ०५३) आदिमें नामोल्लेखपूर्वक खण्डन उनका ग्वण्डन किया है। भत हरिका अस्तित्वममय किया गया है । धर्मकीनिका ई०६:५, प्रज्ञाकरका ई० ई. मन ६०० मे ई०६५०नक मनिीत है । अतः ७० और धर्मोनरका ई० ७२५ अस्तित्वकाल माना विद्यानन्द ई० मन ६५० के पूर्वकालीन नहीं है। जाना है । अतः श्रा० विद्यानन्द ई० मन ७.५ के ३. जैमिनि, शवर, कुमारिल भट्ट और प्रभाकर इन पश्चात्कालीन है। १ इनका समय प्राय. ईमाकी तीसरी, चौथी शताब्दी १ ये इंसाफी चौथी शतीक विद्वान् माने जाते हैं। श्रा० माना जाता है। प. पृ० ६ में व्योमवती पृ० १४६ के 'द्रव्यत्वोपलक्षित २ चीनी यात्री इत्सिंगने अपनी भारतयात्राका वित्र समवायको द्रव्यलक्षण' माननेके विचारका खण्डन किया रमा ई० सन् ६११-१२ में लिखा है और उसमें उसने यह गया है। तथा इसी ग्रन्थ के पृ. २६ पर व्योमवती पृ० ममुल्लेख किया है कि 'भत हरिकी मृत्य हा १० वर्षको १०७ मे समवायलक्षणका समस्त पदत्य दिया गया है। गये। अतः भत हरिका समय ई. सन् ६१० तक निश्चित ३ प्रमेयक मा. प्रस्ता पृ. " है। देखो, अकलंकन की प्रस्तावना । ४ देखो, वादन्यायका परिशिष्ट नं.१।
SR No.538010
Book TitleAnekant 1949 Book 10 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1949
Total Pages508
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size30 MB
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