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अनेकान्त
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इनमेंसे पहली द्वात्रिंशिकाके उद्धरणमें यह सूचित किया है कि 'वीरजिनेन्द्रने सम्यग्ज्ञानसे रहित किया (चारित्र)को और क्रियासे विहीन सम्यग्ज्ञानकी सम्पदाको क्लेशसमूहकी शान्ति अथवा शिवप्राप्तिके लिये निष्फल एवं असमर्थ बतलाया है और इसलिये ऐसी क्रिया तथा ज्ञानसम्पदाका निषेध करते हुए ही उन्होंने मोक्षपद्धतिका निर्माण किया है।'
और १७वी द्वात्रिंशिकाके उद्धरणमें बतलाया है कि जिस प्रकार रोगनाशक औषधका परिज्ञानमात्र रोगकी शान्तिके लिये समर्थ नहीं होता उसी प्रकार चारित्ररहित ज्ञानको समझना चाहिए-वह भी अकेला भवरोगको शान्त करने में समर्थ नहीं है। ऐसी हालतमें ज्ञान दर्शन और चारित्रको अलग-अलग मोक्षकी प्राप्तिका उपाय बतलाना इन द्वात्रिशिकाओके भी विरुद्ध ठहरता है। “प्रयोग-विस्रसाकर्म तदभावस्थितिस्तथा । लोकानुभाववृत्तान्तः कि धर्माऽधर्मयोः फलम् ॥१६-०४॥ आकाशमवगाहाय तदनन्या दिगन्यथा । तावप्येवमनुच्छेदात्ताभ्यां वाऽन्यमुदाहृतम् ॥१६-२५॥ प्रकाशवदनिष्टं स्यात्साध्ये नार्थस्तु न श्रमः । जीव पुद्गलयोरेव परिशुद्धः परिग्रहः ॥१६-२॥"
इन पद्योंमें द्रव्योंकी चर्चा करते हुए धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्योंकी मान्यताको निरर्थक ठहराया है तथा जीव और पुद्गलका ही परिशुद्ध परिग्रह करना चाहिए अर्थात् इन्ही दो द्रव्योको मानना चाहिए, ऐसी प्रेरणा की है। यह सब कथन भी सन्मतिसूत्रके विरुद्ध है, क्योंकि उसके तृतीय काण्डमें द्रव्यगत उत्पाद तथा व्यय (नाश)के प्रकारोको बतलाते हुए उत्पादके जो प्रयोगजनित (प्रयत्नजन्य) तथा वनसिक (स्वाभाविक) से दो भेद किये हैं उनमे वैनसिक उत्पादके भी समुदायकृत तथा ऐकत्विक ऐसे दो भेद निर्दिष्ट किये हैं और फिर यह बतलाया है कि ऐकत्विक उत्पाद आकाशादिक तीन द्रव्यो (आकाश, धर्म अधम)में परनिमित्त. से होता है और इसलिये अनियमित होता है। नाशकी भी ऐसी ही विधि बतलाई है। इससे सन्मतिकार सिद्धसेनकी इन तीन अमूर्तिक द्रव्यांक. जो कि एक एक है, अस्तित्व-विषयमे मान्यता स्पष्ट है। यथा:
"उप्यायो दुवियप्पो पोगजणिो य विस्ससा चेव । तत्थ उ पओगजणिओ समुदयवायो अपरिसुद्धो ॥३२॥ साभावियो वि समुदयको व्व एगत्तियो व्व होज्जाहि ।
आगासाईप्राणं तिएहं परपच्चोऽणियमा ॥३३॥ विगमस्स वि एस विही समुदयजणियम्मि सो उ दुवियप्पो ।
समुदयविभागमेत्त अत्यंतरभावगमणं च ॥३४॥"
इस तरह यह निश्चयद्वात्रिशिका कतिपय द्वात्रिशिकाओं, न्यायावतार और सन्मतिके विरुद्ध प्रतिपादनोंको लिये हुए है। सन्मतिके विरुद्ध तो वह सबसे अधिक जान पड़ती है और इसलिये किसी तरह भी सन्मतिकार सिद्धसेनकी कृति नही कही जा सकती। यही एक द्वात्रिशिका ऐसी है जिसके अन्तमें उसके कर्ता सिद्धसेनाचार्यको अनेक प्रतियोंमे श्वेतपट (श्वेताम्बर) विशेषणके साथ द्वेष्य' विशेषणसे भी उल्लेखित किया गया है, जिसका अर्थ द्वेषयोग्य, विरोधी अथवा शत्रुका होता है और यह विशेषण सम्भवतः प्रसिद्ध जैन सैद्धान्तिक मान्यताओंके विरोधके कारण ही उन्हें अपनी ही सम्प्रदायके किसी असहिष्णु विद्वान्-द्वारा दिया गया जान पड़ता है। जिस पुष्पिकावाक्पके साथ इस विशेषण पदका प्रयोग किया गया है वह भाण्डारकर इन्स्टिट्यूट पूना और एशियाटिक सोसाइटी बङ्गाल (कलकत्ता की प्रतियोंमें निम्न प्रकारसे पाया जाता है