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________________ अनेकान्त [वर्ष वीरत्व-द्वारा जनताको ममझा दिया कि जैमी तुम्हारी स्वयं उम मोक्ष अवश्य मिल सकेगी। चाहे वह किसी भी वर्ण की आत्मा है वैमी ही प्रात्मा अन्य प्राणियोंकी है। जिस और जानिका क्यों न हो? अपने कमौकी निर्जग करनेमे प्रकार तुम स्वपं जीना पमन्द करते हो उसी प्रकार मागेको प्रत्येक प्राणीको मोक्ष मिल मकना है। मोक्षका द्वार किमीके भी जीने दो। 'जीवो और जीने दो के मिदान्त-द्वारा मग- लिये बन्द नहीं है। पान बीरने परमपनीन अहिमा धर्मका महत्व विश्वको बतला गभवानके इम सिद्धान्तका जनता पर मुन्दर प्रभाव दिया। उनकी अहिमा उच्चमे उच्च कोटिकी थी पर उनके पड़ा। लाखोकी तादादम लंग भगरानके अनुयायी बन जीवनम अहिमा कमी भी अव्यवहार्य न हो पायी । उन्होने गये। भगवानके पाम ब्राह्मण, क्षात्रय, वैश्य और शूद्र मब गृहरण और योगीको अहिमाका वास्तविक रूप जनताके यान थे। भगवानके ममक्ष ऊंच और नीचका कोई भेदममक्ष ग्यवा। जनताने अहिमाके मर्मको ममझा और अपने भाव नहीं था। र, आज उन्दी भगवान वीरके अनुयायी जीतनम अहिमाको उत्ताग्नेकी कोशिश की । अहिमाके अावश्यकतामे अधिक साम्प्रदायिकता और कट्टरताक भक्त अान्दोलन-द्वाग यज और कर्मकाण्ड बन्द हो गये। भारत बने हुए हैं। श्राजके जैनी इतने मंकीर्ण विचागे वाले स्यो में मत्य, अहिमा और शान्तिका प्रादुर्भाव दुधा। अहिसाम बने हर है ? ममझमे नही पाना! क्या वे भगवान नारका निश्वका कल्यागा हुअा। यह भगवान बीरकी लोक मेवाका दिव्य-मन्देश भूल गये? जाति-पातिके भेदभावको दर हटा प्रथम पहलू है। कर जनताको मन्मार्ग पर लगाना वीरकी लोक-मेवाका भगवान वीर धर्म-संस्थपकके रूपमे भाग्नमें नहीं पाये दूमग पहलू है। ये। उन्होंने परागगन जैन धर्मका अनुमग्गा करके ही बी-जातिका निगदर करना लोगोंके लिये साधारण मी ईश्वगत्वको प्राप्त किया है। हो, वे धर्म-प्रमारक, और गष्ट्र- बात थी। उनकी बड़ी दुगवस्था थी। कामान्ध स्थायी सुधारक अवश्य थे। वे एक क्रान्निकारी पूर्ण युगपुरुष थे। पुरुषोंने स्त्रियोको अपने भीक माधनकी मामी मात्र समझ उन्होंने भारनमें उम महान गज्यक्रान्तिको जन्म दिया, जिम रकया था। उनके अस्तित्व और अधिकार्ग पर पुष्पा-द्वाग में भारतीय लोगोंके जीवन में कल्पनातीन परिवर्तन हो गया। कुठागघात किया जाता था। वे अपने अधिकारीको भूनी उम समय वर्ण व्यवस्थाकी बड़ी दयनीय अवस्था थी। दुई-मी थी। वे परतत्रााकी वेडियोसे जकड़ी हुई थी। जाति-पांति और ऊँच-नीचका भेद-भाव भारतीय मन्तिाको करुणाके मूर्तरूप भगवान वीर स्त्रियोंकी प्रेमी अवस्थाको न को ग्योम्बला किये हुए गा। कुछ लोगोने धर्मको पैतृक देव मके। उन्होंने स्त्री नानिको कगवरके अधिकार दिलाना मम्पनि ममझ कवी थी और वे लोग ही धर्मके ठेकेदार पमन्द किया । स्त्रियों के मार्गमे जो कटिनाइयो और मढियों बने हुए थे। दूसरे वर्ण के लोगों जन्मजान अधिकारों पर के पहाड़ बडे हुए ये उनको चकनाचूर करके भगवान नीग्ने कुठागपात करनेमे भी वे लोग नही हिचकत थे। उन स्त्रियोंके अधिकारोंकी रक्षा की। इतना ही नही, उन्होंने यह ढोगियोंके बान्य आचरणसे कुछ ऐमा प्रतीत होता था मानों भी बतलाया कि पुरुष मदियोंसे स्त्री-जातिके अधिकागे पर उन्होंने ही मोक्षका पट्टा ले रकबा है, चाहे उनके कृत्य कुठागघात करता चला आया है। पुरषने नारीके मूल्यको कितने ही घणित क्यो न हो ? ऐमे विकराल ममयमे मग- अभी तक समझनेकी कोशिश ही नहीं की है। यह पुरुपकी वान वारने उन मत्ताधारियों को खुला चैलेज देदिया और भारी भूल है। भगवान वीग्ने स्त्रियोंके लिये भी पुरुषोंक उनके विरुद्ध जोरदार आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया | उन ममान ही प्राध्यात्म-मार्ग बोल दिया। वे पापांके ममान लोगोके एकाधिकारको नष्ट भ्रष्ट कर दिया। जाति-योतके ही मामाजिक राष्ट्रीय एवम् धार्मिक कृत्य करनेके लिये भेदभाव को दूर हटा कर जनताको बनला दिया कि मोक्ष स्वतत्र ममझी जाने लगी। नारी जातिके अधिकागेके लिये पर किमी वर्ण या नानि-विशेष अथवा कुछ चुने हुए लोगों इतना प्रयास करना वीरके जीवनका क्रान्तिकारी स्टेप का ही अधिकार नहीं है । मोक्ष प्रामि सब प्राणियोंका जन्म- (Step) था। वीग्ने यह भी मिद कर दिया कि स्त्रियाँ मिद्ध अधिकार है। जो व्यक्ति श्रादर्श जीवन व्यतीत करेगा गुरूपदको भी प्राप्त कर सकती हैं। वीरका प्रधान लक्ष्य
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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