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________________ किरण १-२] वीरकी लक-पवा नोक-कल्याण था। ४३ वर्षको अवस्थामे ७२ वर्षकी अपरिग्रहादका निकर्ष है। वीर एक तरह से अपने ममप अवस्था नक वीरका पवित्र ज'वन लोक-मेवा ही म व्यतीत के मवमे बड़े माम्गवादी थे। वे चाहते थे कि मब प्राणी इश्रा । इममे मालूम होता है कि बारका जीवन लाक- अानन्दमे रहें । हम विश्वके ममस्त प्राणी सुग्नमे रहें । वीर कल्याणार्य ही हुआ था। प्रभु इस बातको अवश्य जानते थे कि यदि कोई व्यक्ति मच्चा वीर अपना मार्ग म्यं निर्धारित करना है। वीर अावश्यकतामे अधिक सम्पत्ति और वस्तुये जुटाण्यानो भगवानने भी ऐमा ही किया। उनमे पहिले होने वाले दूसरे मनुष्योकी श्रायश्यकीय वस्तुप्रीमे कमी पडेगी। यह अाचा अर महात्मा संस्कृत भाषाम उपदेश देने थे पार भी भलीभौनि जानते थे कि गगयोंके रक्त-शोषणमे ही नामस्कृन हमेशामे विद्वानों की भाषा रही है। अत: मर्वमाधा- पात बनते हैं। अत: जन-हिनकी ओर हा रम्बने हुए उन्हों गणननी उम भाषाको बोल सकते थे और नममझ माने ने अपरिग्रहवादकी मुष्टि की। त्रयों और शद्रोंकानो मम्कृत बोलनेका अधिकार भी वीर चाहते थे कि मनुष्य वीर बनकर ममाग्मे रहे। इमीम मम्मत नहीं था। लोग उन मत्परूपांके उपदेशोंमे अधिक उन्होने सदाचार और ब्रहाचर्य र अधिक जोर दिया। ब्रानाम नहीं ले मकते थे। पर भगवान वाग्ने म ममयकी च यंके पालन बिना-वीर्यकी रक्षा बिना-मनुष्य वीर नही बन मर्च-माधारणकी प्रचलित भाषामे उपदेश देना प्रारम्भ मकता । कमजोर श्रादमी कापुरुषकी भाति ममाग्मे श्रग्नी किया। मंस्कृतका मोह घटाकर जनताकी भाषाका महत्व जीवन-लीला व्यतीत करता है। उसका जीना न जाना बदाया। भगवानके उपदेशका जनता पर पर्यात प्रभव बराबर है । वीरका नीवन आदर्श होना। वीर परुष मब पड़ा। वीरका उपदेश अमीर और गरीब, राजा और फकीर का हो जाता और मब उसकं । अत: भगवान वाग्ने यहां तक कि पशु और पक्षी मबके लिए हिनकर था। यह वाय-रक्षाका महल बतलाकर भीलोककी अपूर्व मना की। है। नोवारण है क के उपदेशों और दिव्य सन्देश वीरका सम्पूर्ण जीवन श्रात्मानुभूति (Selg मबका कल्यागा हुआ। realization) और मर्वस्वत्याग (Sehrage) वीग्ने बतलाया कि अावश्यकतासे अधिक वस्तुओंके का जीवन है । वे ममारके आदर्श-संबक थे। उन्होंने अपने मञ्चयमे मनुष्यकी प्रकृति चंचल रहती है। अधिकाधिक अगाध और अबाध ज्ञान-द्वाग ममारकी श्रचक मेवा की मन यस तृष्णा बढ़ती जाती है । और कभी कभी उमे धनका है। उनका जीवन ही लोक-सेवाका जीवन है । उनका उन्माद मताने लगता है। वह न्यायमार्गका छोड देता जीवन, तप, त्याग और ज्ञान महान है। अन्तम कहना और मंमाग्म कुकृत्य करनेपर उतारू हो जाता है। हम होगा कि भगवान महावीर वास्तवम महावीर है, प्रादर्श लिये मनुष्यको मयत जीवन व्यतीत करनके साथ वस्तुश्री पुरुष है। मन्मार्ग-प्रदर्शक सच्च लोक मनक, अनु की सीमा भी निर्धारित रखनी चाहिये । मनुष्यको आव- करणीय महात्मा है और इसलिय उपामनीय है-भागश्यकतासे अधिक वस्तुएं नहीं बनी चाहियं । यह वाग्के धना किये जानेक योग्य है। वीरसेवामन्दिरके सदस्योंसे निवेदन वीर-शामनके अवतार को २५०० वर्ष हो चुके, इस उपलक्षमें समका माधयमहस्राब्दि-महोत्सव ता.३१ अकर मे ५ नवम्बर मन् १४ (कार्निकसुदि पूर्णिमामे मार्गशीर्ष बदि चतुर्थी) तक कलकत्ता रावराजा मर मेठ दुकमचन्दजी इन्दौरके सभापतित्वमें बड़ी धूम-धामके साथ मनाया जायगा । माथमें, जैनमाहिन्य-मम्मेलन मी होगा, जो अनेक विषयों के अनेक सभापतियोंके मभापनिबमें अपना कार्य सम्पन्न करेगा । मा.दि.जैन तीर्थक्षेत्रकमेटीका अधिवेशन भी होगा। मभी प्रन्तोंके श्रीमान् और श्रीमान् पधारेंगे। संक्षेप में यह महोत्सव जैन इतिहास, माहिग्य और संस्कृतिक दृष्टिमे अपूर्व होगा। अनः वीरसेवामन्दिरके सदस्यों और उमकी कमेटीके मेम्बरोंमे सामतौरपर निवेदन है कि वे हम मुभ अवमरपर अवश्य ही कलकत्ता पधारने की कृपा करे, और इस शामन-सेवाके महान् कार्य में अपना पर महयोग प्रदान करके हमें अनुगृहीन करें। -जुगलकिशोर मुम्तार (अधिष्ठाता), पन्नालाल जैन अप्रवाल (मंत्री
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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