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________________ वीरकी लोक-सेवा (ले०-वा० माणिक्यचन्द्र जैन, बी० ए०) -- - "जब अधर्मका दुम्बद गज्य होता है जागे। रक विषय-कषायोके वशीभूत अथवा इन्छाअकि गुलाम न होने हैं अन्याय जगनम निश-दिन भारी॥ थे। इच्छाश्रीको दमन करनेकी शक्ति उनम भरपूर थी। मामाजिक सब नीनिीतियाँ नम जाती है। अशवा । कहिये कि व ऐसी इच्छाश्रीको उम्पन्न ही नही अनाचार -वृत्तियों हृदयमे बम जाती है। होने देते थे। भगवान महावार मंमारके श्रादर्श-सेवक एवम् नब ऐसे मत्पुरुपका, हाना झट अवतार है। मनुष्यों के मफल मनानायक थे। ममारमेमे बर्बरताको दूर जो अपने मच्चरिनम, हरना पापाचार है॥" हटाकर मनुष्योको हिमा, शान्ति, मल और मदाचारका (पुष्कल) पाठ पटाना उनके जीवनका उद्देश्य था । वे मर प्राणियों भगवान् वीर सन्चे वार हैं। मंमारक बड़से बड़े पुरुषों की पावन पथका अनुगामी बनाना चाहते थे। व मनुष्यको मेमे वे एक हैं। वे हमाग तरह ही माना रहे है। नरम मानव बनाना चाहते थे। शैता'नयत और हैवानियतको नागपग हुए हैं। उन्होंने लोकिकनामे अलौकिकता पामका दर हटाकर इन्मानियनका आधिपत्य स्थापित करना है। इसीलिये उनका जीवन हमारे नये श्रादर्श है। मारी चहत थे। मनुष्य जातिको ऐसे ही श्रादर्शकी श्रावश्यकता है। मनुष्य अत्यन्त ऋर बन गया था। इनना कर कि एक अंग्रेज विद्वान्ने भगवान वाक जीवनपर प्रकाश उसकी ऋग्ना शेर और बचीमा ऋग्नाको भी मान करती डालते हुए कहा है : थी। दया श्री विवेकको कोई स्थान नहीं मिला हा था। __"But I want to interprete मानवताक स्थानपर पाशविकता काण्ड ताण्डव कर रही Mahabird's lite as using fronm थी। पाखण्डी महात्मा बने हुए थे । जनता त्राहि त्राहि कर "Manhood to Godhood" And not as रही थी। पशुबलि और कर्मकाण्डका अभिक्य था। दीन from "God hood to super Godhood" पशुश्रीको प्राननाद मुनने वाला कोई न था। इतना ही It that were so I would not even नही, भाग्नवसुन्धग पर नग्मेध-यज भी प्रचलित होगये थे। touch Mahalira's life, as we are not इन यजी श्रार कर्मकाण्डोम जनता विक्षुब्ध हो उठी थी, पर gods bur IAI. Man is the greatest उस ममयम धर्माचार्यों का विरोध करनेकी ताकत तत्कालीन subject for man's study" जनताम न थी । ऐम मंक्टा-गन-विनियम्न ममयमे, मत्य, अर्थात्-महावीरक जीवनका महत्व यह है कि वह अहिमा और मानवता के प्रतीक अादर्शवीर भगवान महावीर पुरुष मनुष्यवसे ईश्वरत्वकी ओर बढा है, न कि ईश्वर- वीर अपने विचागेको न दवा मक। उन्दोंने मामारिक तसे परमेश्वरत्वकी ओर । अगर वह ईश्वग्त्वमे परमेश्रग्त्वकी भौगोपभोगोंको लात मार कर लोक कल्याणका हामंकल्प ओर बढ़ता तो मैं उनके जीवनको स्पर्श नक न करना, क्यों किया। कि हम मनुष्य है देवता नहीं। मनुनही मनुष्य के लिये भगवान बीग्ने उम ममयके प्रचलित अत्याचारपूर्ण सबमे अधिक अध्ययन करनेकी वस्तु है।" रीति-रिवाजो और विधि-विधानों के खिलाफ तथा ढांग और उक्त लेखकका विचार यथार्थ है। भगवान वीर मच्चे उमके पोषकोंके विरुद्ध अपनी भावान बुलन्द की। यजी मानव थे। मानव-जीवनकी वास्तविकताको वे खूब ममझते और कर्मकाण्डाको कडी बालोचना करके पे धूपित कृत्या थे। उनमें चरित्रका तेज और शानका बल था। वे मामा के खिलाफ जिहाद बोल दिया। अपने तप, त्याग और
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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