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________________ १०२ अनेकान्त मालूम हा कि वे अपने अन्तिम जीवनमे भी वीर बनी स्वयं मातृ-वियोग जैसे कष्टका अनुभव कर रहा हूँ। रही है। उन्होने अपने कष्टको स्वयं झेला, दमरो पर अपना माताकी तरह श्रार सदा ही मेरे हितका ध्यान रखती, मुझे दुःख व्यक्त नही किया और न मुखमुद्रापर ही दु:स्वका कोई धैर्य बँधाती और सत्कार्योंके करनेमे प्रेरणा प्रदान करती खास चिन्ह प्राने दिया-इस खयालसे कि कही दूसरोंको रही हैं। हार्दिक भावना है कि श्रामको परलोकमें यथेष्ट कष्ट न पहुँच जाय,' कुल्हने-कगहनेका नाम तक नहीं सुना सुख-शान्तिकी प्राप्ति होवे । गया, गुस्सा और मुझलाहट जो अक्सर कमजोरीके लक्षण हॉ. अपने दानका संकल्ल श्राप बहत पहलेसे कर पास नहीं फटकन थ, पूछन पर भा कि तुम्ह क्या चुकी थी, जिसकी संख्या १००१) रु० है और जिसका कछ वेदना है?-मिर हिला दिया, नही। ऐसा मालूम विभाजन निम्नप्रकारसे किया गया है:होता था कि श्राप कर्मोदयको समताभावके साथ महन १००) दोनो श्रीजैनन्दिरजी, नानौता। करती हुई एक माध्वीके रूपमे पड़ो हैं। अापकी परिगति ३००) जैनकन्या-पाठशाला, नानौता। बहत शुद्ध रही है, पाशा, तृष्णा और मोह पर आपने बड़ा २५०) वीरसेवामन्दिर, सरसावा । विजय प्राप्त किया है, किसी चीजमे भी मनका भटकाव नहीं ) जैनवाला-विश्राम, श्राग। रसखा. किसी भी इष्टपदार्थस वियोगजन्य कष्टकी कोई रूप- १०.) मुमुक्षु-महिलाश्रम, महावीरजी। रेखा तक आपके चेहरे पर दिखाई नहीं पड़ती थी। किसी १५) जैनकालिज, बड़ौत । को कुछ कहना या सन्देश देना है ? जब यह पूछा गया तो १०) श्राविकाश्रम, बम्बई। उत्तर मिला-'नहीं'। इतनी निस्पृहताकी किसीको भी १०) जैनमहिला-परिषद्, श्रा।। श्राशा नही थी। अापने सब बारसे अपनी चित्त-वृत्तिको हटा १०) जैनकन्या-पाठशाला, सहारनपुर लिया था, धार्मिक पाठोको बड़ी रुचि तथा एकाग्रताके १०) जैनकन्या-पाठशाला, कैराना (मुजफ्फरनगर)। सुननी थी और उनमे जहाँ कहीं वन्दना या उच्चभावोके ५) जैनअनाथालय, देहली। प्रस्फुटनका प्रसंग प्राता था तो श्राप हाथ जोड़ कर मस्तक ५) ऋषभब्रह्मचर्याश्रम, मथुग। पर रखती थों, और इस तरह उनके प्रति अपनी श्रद्धा तथा ५) दि० जैनसंघ, मथुरा भक्ति व्यक्त करती थी। इन सब बातोसे श्रापकी अन्तरात्म ५) स्याद्वाद-महाविद्यालय, बनारस । वृत्ति और चित्तशुद्धि सष्ट लक्षित होती थी। अन्त ममय ५) महावीर ब्रह्मचर्याश्रम, कारंजा । तक प्रारको होश रहा तथा चित्तकी सावधानी बराबर बनी ५) सत्तर्क सुधातरंगिणी जैनपाठशाला. सागर । रही, और इस तरह आपने समाधि-पूर्वक देहका त्याग किया ५) जैनौषधालय, बडनगर । है, जो अवश्य ही आपके लिये सद्गतिका कारण होगा। ५) नमिसागर जैनौषधालय, देहली। देहत्यागके समय आपकी अवस्था ८६-८७ वर्षकी ५) जैनस्वैराती शफाखाना, सहारनपुर । थी। आपके इस वियोगमे श्रापकी पी गुणमाला और पोती ५) जैनकीर्तन, नानौता। जयवन्नीको जो कष्ट पहुँचा है उसे कौन कह सकता है ? मैं । ___४५) पत्रोकी सहायतार्थ, जिनमें २५) अनेकान्त, १०) *मेरे पहुँचनेसे कुछ दिन पहले जब उनसे पूछा गया कि जैनमहिलादर्श, ५)जैनसन्देश और ५) जैनमित्रको। 'क्या तुम भाईजीको देखना चाहती हो उन्हें बुला' तो १) मनीआर्डर खर्च। उन्होंने यही कहा कि देखने की इच्छा तो है परन्तु उन्हें . दु:म्वित-हृदय श्राने में कष्ट होगा ! दूसरोके कष्टका कितना ध्यान !! १००१) जुगलकिशोर मुख्तार
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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